कांगड़ा, रितेश ग्रोवर। श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करने वाली श्रद्धा की प्रतीक, विश्व-विख्यात बज्रेश्वरी देवी मंदिर कांगड़ा के मंदिर मे हर वर्ष की भांति इस बार भी सात दिवसीय घृत मंडल पर्व का आयोजन शुक्रवार को शुरू हो गया। कांगड़ा का बज्रेश्वरी देवी मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। यहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था। कई शताब्दियों से चली आ रही ऐतिहासिक परंपरा घृत पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है परंतु इस बार बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण घृत पर्व का आयोजन एक साधारण स्तर पर किया गया।

रात्रि आठ बजे के बाद श्रद्धालुओं को मंदिर से बाहर करने के बाद मंदिर के पुजारियों ने ही माता की पावन पिंडी पर देसी घी से तैयार किए मक्खन को चढ़ाया। वहीं कोरोना संकट से पहले पूर्व में हुये घृत पर्व के आयोजन पर मक्खन के श्रृंगार को देखने के लिए देश के कोने-कोने से श्रद्धालु पहुंचते थे परंतु इस बार माता का दरबार सूना रह गया। मकर संक्रांति का दिन होने के कारण भी शुक्रवार को मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ तो काफी उमड़ी परंतु ऐतिहासिक धार्मिक उत्सव में श्रद्धालुओं को मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नही दी गई। प्रदेश सरकार द्वारा भी ऐतिहासिक घृत पर्व को जिला स्तरीय पर्व का दर्जा दिया गया परंतु पहली बार हाने वाले जिला स्तरीय पर्व कोरोना संकट की भेंट चढ़ गया। कोरोना संक्रमण के कारण मंदिर में तो ना तो विशेष साज सजावट की गई और ना ही भगवती जागरण का आयोजन हो पाया।

कई शताब्दियों से चले आ रहे इस पर्व में श्रद्धालु अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते हैं परंतु इस बार श्रद्धालुओं की मनोकामना कोरोना ने पूरी नहीं होने दी। ऐतिहासिक धार्मिक घृत पर्व मान्यता है कि मकर सक्रांति से लेकर एक सप्ताह तक इन मंदिरों में मौजूद पिंडी के ऊपर कई क्विंटल मक्खन का लेप चढ़ाया जाता है। माघ मास की मकर संक्रांति के दिन से आरंभ होने वाले इस विशेष आयोजन पर मां बज्रेश्वरी मंदिर व बर्फ से ढकी धौलाधार की चोटियों की मनोहारी छटा माहौल को दार्शनिक बना देती है।

इस विशेष घृत मंडल के आयोजन के उद्देश्य के संबंध में कहा जाता है कि जालंधर दैत्य को मारते समय माता के शरीर पर अनेक चोटें आई थीं तथा देवताओं ने माता के शीर पर घृत का लेप किया था। उसी परंपरा के अनुसार एक सौ एक देसी घी को एक सौ बार शीतल जल से धोकर उसका मक्खन बनाकर माता जी कि पिंडी पर चढ़ाया जाता है। इस घी के ऊपर नाना प्रकार के मेवे और फल मेवों की मालाएं सुसृजित की जाती है।

अब सात दिनों तक नहीं मिलेगा माता का चरणामृत

सात दिनों तक चलने वाले घृत पर्व को लेकर माता की पिडी पर सात दिनों तक मक्खन का लेप रहेगा ओर ऐसे में अब माता की पावन पिंडी का स्नान सात दिनों तक नही होगा। ऐसे में माता का मिलेने वाला चरणामृत अब सात दिनों बाद ही श्रद्धालुओं को मिलेगा।

देसी घी को 101 बार ठंडे जल में रगड़ रगड़ बनाया जाता है मक्खन

कांगड़ा : मान्यता के अनुसार देसी घी को 101 बार ठंडे जल में रगड़ रगड़ मक्खन बनाया जाता है जिसमें पुजारियों को कड़ी मेहनत करनी पड़ती है और ऐसे मौसम में मक्खन बनाने के दौरान पुजारियों को कई परेशानियों से गुजरना पड़ता है। बर्फ जैसे ठंडे पानी में देसी घी को 101 बार रगड़ना और मक्खन निकालना की कल्पना से ही कई लोगों के पसीने छूट जाते है परंतु हर वर्ष पुजारियों को इस विधि से गुजरना पड़ता है। शिक्तपीठ श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर में इस अदभुत कार्य के आयोजन की ख्याति पूरे भारत वर्ष में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में विख्यात है और इस कार्य को देखने के लिए भी कई श्रद्धालु माता के दरबार में पहुंचते है। मंदिर की यज्ञ शाला में मक्खन बनाने की विधि चल रही है और आने वाले आठ दिनों तक तक्खन बनाने का कार्य चलता रहेगा।

52 शिक्तपीठों में से एक है माता श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर

शिक्तपीठ माता श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर 52 शिक्तपीठों में से एक है। यहां सती का दाहिना वक्ष गिरा था। यहां मां की तीन पिंडियों भद्रकाली, एकादशी व माता बज्रेश्वरी के रूप पूजा की जाती है। कई शताब्दियों से चले आ रही परंपरा के तहत मंदिर में हर वर्ष मक्कर संक्रंाति को घृत पर्व मनाया जाता है।

घृत पर्व के लिए क्या है मान्यता

शिक्तपीठ माता श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर का मुख्य आयोजन घृत पर्व होता है जो कि वर्ष में एक बार यानी मक्कर संक्रांति को मनाया जाता है। इस विशेष घृत मंडल के आयोजन के उद्देश्य के संबंध में कहा जाता है कि जालंधर दैत्य को मारते समय माता के शरीर पर अनेक चोटें आई थीं तथा उन चोटों को ठीक करने के लिए देवी देवताओं ने माता के शरीर पर घृत का लेप किया था। देवी देवताओं ने घृत का लेप देसी घी को एक सौ एक बार शीतल जल से धोकर उसका मक्खन बनाया था और उसे माता की शरीर पर आये घावों पर लगाया था। उसी परंपरा के तहत हर वर्ष घृत पर्व का आयोजन शिक्तपीठ माता के मंदिर में होता है मक्कर संक्रांति को कई क्विंटल देसी से तैयार मक्खन माता जी कि पिंडी पर चढ़ाया जाता है। इस घी के ऊपर नाना प्रकार के मेवे और फल मेवों की मालाएं सुसृजित की जाती है। यह घृत सात दिनों तक चढ़ा रहता है।

सात दिनों तक माता की पावन पिंडी पर रहता है मक्खन

ऐतिहासिक परंपरा के तहत माता की पावन पिंडी पर चढ़ा मक्खन सात दिनों तक माता की पावन पिंडी पर रहता है और सात दिनों बाद उसे माता की पिंडी से उतारा जाता है। उसके पश्चात इसे प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

औषधी बन जाता है मक्खन, मक्खन लेने के लिए मंदिर में लगी हैं लाइनें

माता की पावन पिंडी पर चढ़ाया गया मक्खन एक औषधी बन जाता है। माता के शरीर पर आये घाव को मक्खन के लेप से सात दिनों के बाद हटाया गया था तो घाव बिलकुल ठीक हो गये थे और इसी घारणा के तहत मक्खन रूपी प्रसाद को लेने के लिए हजारों श्रद्धालु 20 जनवरी को मंदिर पहुंचते है जब माता की पिंडी से मक्खन उतारा जाता है। मंदिर के पुजारी पंडित राम प्रसाद के अनुसार इस मक्खन रूपी प्रसाद से धाव, फोड़े आदि पर लगाने से उनका उपचार हो जाता है। देश-विदेश से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस अद्भुत प्रसाद को लेने के लिए कांगड़ा पहुंचते हैं।

Edited By: Richa Rana