अश्वनी शर्मा, जसूर। डेढ़ दशक पूर्व उपमंडल नूरपुर का अधिकांश क्षेत्र देसी संतरे की पैदावार के लिए छोटे नागपुर के नाम से जाना जाता था, लेकिन अब किन्नू संतरे पर भारी पड़ा है। अब क्षेत्र से देसी संतरे का अस्तित्व लगभग खत्म हो गया है। वर्तमान में हालात ये हैं कि देसी संतरे की जगह अग्रिम किस्म किन्नू ने ले ली है। अधिकांश क्षेत्रों में स‍िंचाई सुविधा न होने से यह किस्म भी किसानों के लिए फायदेमंद नहीं है।

स‍िंचाई सुविधा के अभाव में किन्नू का सही आकार नहीं बन पाता है। साथ ही नीरस रहने से मार्केट में भी अच्छा दाम नहीं मिल पाता है। अब लोगों को देसी संतरे का स्वाद लेने के लिए अन्य राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है।

ये क्षेत्र थे देसी संतरे के गढ़
उपमंडल नूरपुर के बासा बजीरा, गनोह, पंजाहड़ा, अगाहर, भड़वार, खज्जियां, जौंटा, कमनाला, सुतराहड़, जसूर, छतरोली, राजा का बा़ग, चरूड़ी, वासा हडियाला, सुखार, कंडवाल, नागाबाड़ी, लोधवां, इंदौरा, इंदपुर व डाहकुलाड़ा क्षेत्रों में देसी संतरे की काफी पैदावार होती थी। अब यहां देसी संतरे का एक भी पौधा नहीं मिलता है।

देसी संतरे व किन्नू में यह है अंतर
देसी संतरे के पौधे में करीब दस साल बाद फलता है तो किन्नू का पौधा छह-सात साल में ही फल देने लगता है । इसी लालच में बागवानों ने किन्नू को आजमाया लेकिन सिंचाई सुविधा न मिलने से यह बागवानों के लिए फायदेमंद साबित नहीं हुआ है।

देसी यानी नूरपुरी संतरे की पहचान लुप्त होने की कगार पर है। अधिकाश भागों में पर्याप्त ¨सचाई साधन न होने से संतरे की पैदावार प्रभावित हुई है। -गणेश पराशर, बागवान

डेढ़ दशक पूर्व देसी व आगरे संतरे के क्षेत्र में बागीचे थे। किन्नू प्रजाति भी अनुकूल परिस्थितियां न होने के कारण दम तोड़ रही है। सरकार को सिंचाई सुविधा मुहैया करवानी चाहिए। -सरदार स‍िंह पठानिया, बागवान

सब्जी मंडी जसूर में 2016 में 110 क्विंटल किन्नू बिका था। 2017 में इसका एक चौथाई हिस्सा भी नहीं पहुंचा। लगातार पैदावार कम हो रही है। -बृजभूषण डोगरा, मंडी पर्यवेक्षक जसूर।

जिले में संतरे की पैदावार 3267.75 हेक्टेयर क्षेत्र में होती है। नूरपुर क्षेत्र में 91.36 हेक्टेयर भूमि पर पैदावार होती है। किन्नू, माल्टा, आगरा व नागपुरी किस्मों की आयु तीस साल होती है। इस प्रजाति के पौधों की बहुत ज्यादा देखभाल की आवश्यकता होती है। ¨सचाई के साधनों से ही पर्याप्त फल लिया जा सकता है। गिरता भूजल स्तर भी इसकी पैदावार में कमी का प्रमुख कारण है। दौलत राम वर्मा, उपनिदेशक उद्यान विभाग कांगड़ा

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