नवनीत शर्मा, धर्मशाला। आपदाएं सिर्फ भौगोलिक दृष्टि से नहीं आतीं, राजनीतिक दृष्टिकोण से भी आती हैं। और यह भी सच है कि जब आपदा का जिक्र आए तो पूर्व प्रबंधन और प्रबंधन जैसे शब्द भी सुने जाते हैं। आपदा प्रबंधन जिस मर्जी शक्ल में हो, मजबूरी में उसे दिखना ही पड़ता है। लेकिन पूर्व आपदा प्रबंधन उतना ही दिखता है जितना राजनीति या नारों में सच। पूर्व आपदा प्रबंधन ठीक हो तो आपदा प्रबंधन या उत्तर आपदा प्रबंधन की भूमिका कम हो जाती है। बेशक आपदाओं या हादसों के बारे में काबिल अजमेरी कह चुके हैं :

वक्त करता है परवरिश बरसों

हादसा एकदम नहीं होता

राजनीतिक हादसे भी कम होते हैं, न एकदम होते हैं। हम हादसा कहते हुए इन्सानी या तकनीकी चूक को संदेह का लाभ देने का बड़ा दिल बेशक दिखा लें...। उसकी पूर्वपीठिका बन रही होती है। वह धीरे-धीरे आदतों में ढल रही होती है।

चंडीगढ़ में एक मंत्री की पत्नी सरकारी गाड़ी में जाती हैं और ढाई लाख रुपये चोरी हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर चली हवाओं ने विपक्ष को तूफान खड़ा करने का अवसर दिया। कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री आशा कुमारी ने मंत्री के बहाने सरकार को घेरा। दरअसल आपदा के कारण दो थे... पहला यह कि इतनी नकदी लेकर चलना आयकर के नियमों के मुताबिक नहीं है। दूसरा यह कि गाड़ी सरकारी थी। घटना को हुए कई दिन बीत चुके हैं, जांच की बात भी की जा रही है। जांच कब होगी, पता नहीं लेकिन अब विपक्ष भी चुप है। जनता फिलहाल उबाल में है लेकिन कब तक याद रखेगी, कह नहीं सकते। छाछ और लड़ाई को बढ़ाना ही बेहद आसान नहीं है, आरोप लगाना भी बहुत सरल है। कुछ आवाजें यह कह रही हैं कि क्या पता सिर्फ ढाई लाख ही थे!! फिर ये आवाजें भी आईं कि वन मंत्रियों के साथ ही ऐसे मामले क्यों होते हैं, यह भी शोध का विषय है। एक बार कांग्र्रेस सरकार के समय चंडीगढ़ में तत्कालीन वन मंत्री का भी बैग गुम गया था। यह मंत्री जी के अलावा केवल भगवान ही जानता है कि उसमें क्या था।

लेकिन कई महत्वपूर्ण विभाग संभालने वाले मंत्री जी और उनके परिजनों का पूर्व आपदा प्रबंधन के साथ वास्ता होता तो वह इतनी राशि लेकर चलते ही क्यों? प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया के सपने का सम्मान भी तो आवश्यक ठहरा। अब तो लगभग हर आदमी का खाता खुला है। दूसरा यह कि सरकारी गाड़ी से बचना चाहिए था। चलिए...!! पूर्व आपदा प्रबंधन नहीं हुआ...आपदा प्रबंधन ही हो जाता। आपदा प्रबंधन करने के लिए खांटी राजनेता होना बेहद आवश्यक है। कोई चुस्त और राजनीतिक रूप से दुरुस्त राजनेता होता तो प्राथमिकी दर्ज न करवाता। चुपचाप इस विष को पी जाता। इस दृष्टि से आपदा प्रबंधन भी नहीं हुआ। सार्वजनिक जीवन में जब आते हैं तो जीवन आईना बन जाता है और सवाल हमेशा पीछा करते हैं।

हैरानी तब हुई जब मंत्री ने कुछ दिन बाद कहा कि वह स्वयं भी वहां थे, यानी चंडीगढ़ में थे। उनके इस तर्क को जनता कितना मानेगी और कितना नहीं, यह जनता पर ही छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन जनता हो या राजनेता, अब छिपना-छुपाना आसान नहीं रहा। बहुत संभव है कि हर आचरण का कोई जवाब हो, उसे तर्कसंगत ठहराने का तरीका हो, लेकिन सार्वजनिक जीवन में ऐसे मौके देना ही उचित नहीं है। इस हादसे ने यह पथ अवश्य खोल दिया है कि अब हादसों की परवरिश करने से पहले लोग ठिठकेंगे जरूर...एक बार ही सही, मूल्यों का मूल्यांकन भी प्राथमिकता होगा। 

उपचुनाव, राजधानी और लिटफेस्ट

अपनी अलग सोच रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री शांता कुमार भी धर्मशाला उपचुनाव में आए। आते ही कह दिया कि धर्मशाला को दूसरी राजधानी बनाना बेमानी है। चुनाव या उपचुनाव के दौर में परिवेश के कान वही सुनते हैं और सुनना चाहते हैं जो राजनीतिक रूप से सही हो। शांता उससे विपरीत चले लेकिन विपक्ष ने इसे भी मुद्दा बना लिया और कहा कि धर्मशाला को हाथ लगा कर बताएं। सच यह है कि धर्मशाला को सब छूएं, यही धर्मशाला की प्रकृति है। और इसे हाथ भी इतने और इतनों के लगे हैं कि धर्मशाला ही जानता है।

अभी न राजधानी है, न उसके अनुकूल दफ्तर...न नगर निगम और जनता में कोई नजदीकी है। इस पर नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री समेत कई कांग्रेस नेताओं ने शांता को नसीहत दे दी। जिनको धर्मशाला की चिंता हो, वे सत्ता पक्ष में हों या प्रतिपक्ष में...ये सवाल क्यों नहीं दिखते कि अब तक केंद्रीय विश्वविद्यालय हवा में क्यों है? बीते दो साल में कोई एक बड़ा विकास कार्य बता दें? दो मंत्रियों की खींचतान में धर्मशाला का नुकसान क्यों हुआ है? कोई बताएगा कि धर्मशाला का शहरी विकास किस गांव में छुपा हुआ है?

बहरहाल, शांता ने अपनी उदारवादी छवि के अनुरूप यह भी कहा, 'कसौली में लिटफेस्ट अवश्य होना चाहिए... संवाद हो, विवाद नहीं'! वहां मुस्लिम मॉब लिंचिंग पर बात हुई, अनुच्छेद 370 के खिलाफ बातें हुईं...कुछ पत्रकारों ने तो यहां तक कहा कि अभी उचित समय नहीं था। ठीक है, संवाद होना चाहिए लेकिन विवाद किस तरफ से हुआ यह भी देखा जाना चाहिए। ऐसा क्यों हो कि अतिथियों का चयन एक ही ओर को झुका हुआ क्यों हो? सुनी-सुनाई वही डफलियां, वही राग क्यों? गुलदस्ता वही सुंदर होता है जिसमें कई तरह के फूल हों। यह तो जनरल अता हसनैन साहब ने बात को संतुलित कर दिया वरना शशि थरूर और मणिशंकर अय्यर जैसे नाम ही दिखते हैं यहां। शशि थरूर और अय्यर क्या कहते हैं या कहेंगे, क्या यह अब रहस्य रह गया है? पुतला दहन बुरी बात है और वे कारण भी ढूंढ़े ही जाने चाहिए कि क्यों सोलन में शांता कुमार का पुतला जलाने की नौबत आ गई?

Posted By: Rajesh Sharma

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