धर्मशाला, नवनीत शर्मा। हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहली बार इतने बड़े स्तर पर ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट वीरवार से शुरू हो जाएगी। इस दो दिवसीय आयोजन को भव्यता इसलिए भी मिलेगी क्योंकि आरंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। कांंगड़ा हवाई अड्डा लाल कालीन पर प्रधानमंत्री के स्वागत के लिए तैयार है। आयोजन बेशक दो दिनों का है, लेकिन इसके पीछे का श्रम दो दिन का नहीं है। एक लंबा सिलसिला था जिसे पार कर अब यह मुकाम आया है। इस आयोजन से कितना लाभ होगा, कितने रोजगार सृजित होंगे, यह हिसाब करने का वक्त अभी नहीं है। अभी तो दो प्रमुख बिंदु प्रदेश सरकार के खाते में जा रहे हैं। एक, इतनेे बड़े आयोजन को जमीन पर साकार करना और दूसरा यह कि केंद्र ने इस आयोजन के लिए अब तक करीब 11 करोड़ रुपये भी प्रदान कर दिए हैं। कुछ खर्च हिमाचल प्रदेश सरकार भी करेगी लेकिन बड़ा हिस्सा केंद्र ने दे दिया है।

नामी उद्योगपतियों के आने से हिमाचल के पहाड़ों में संसाधनों में वृद्धि के सपनों को भी ताबीर मिलने की संभावनाएं जगी हैं। अब तक बागवानी और उसमें भी सेब पर निर्भर रहा है हिमाचल। या फिर पन विद्युत ने कुछ रवानी दी है। कृषि का हाल सबके सामने है। ले देकर पर्यटन ही ऐसा क्षेत्र बचता है, जिसमें प्रकृति भी साथ है, समय भी और अपेक्षाएं भी।

इससे पहले प्रदेश से बाहर औद्योगिक निवेश के लिए रोड शो होते रहे हैं। निवेशकों को लुभाने के प्रयास भी हुए लेकिन इतना प्रयास पहली बार हो रहा है, इस पर संदेह नहीं होना चाहिए। इतना बड़ा कारज बिना विघ्न के संपन्न हो, सदिच्छा के साथ कार्य संपूर्ण हों, यह उम्मीद भी करनी चाहिए और प्रयास भी। मूलत: मनीऑर्डर अर्थव्यवस्था रहे प्रदेश को अब भी कई चीजों की जरूरत है।

इस प्रयास से यह होगा कि देश-विदेश के नामचीन चेहरे हिमाचल की क्षमता को पहचान सकेंगे। हिमाचल प्रदेश सरकार ने नया उद्योग लगाने के लिए तीन साल तक अनापत्ति लेने की जरूरत को खत्म करके एक सकारात्मक संकेत दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी को हिमाचल कई कारणों से याद करता है। उनमें से एक है हिमाचल को मिला औद्योगिक पैकेज। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हिमाचल प्रदेश के लिए कोई इससे मिलती जुलती घोषणा कर दें तो हिमाचल निश्चित रूप से आगे बढ़ सकता है।

वास्तव में, हिमाचल प्रदेश की एक विशिष्ट स्थिति है। केवल हरियाली के साथ पेट भरे, यह संभव नहीं है। ये हरियाली बेहद जरूरी है लेकिन हवा के साथ-साथ आर्थिकी की बयार भी लाए, यह सोचने का यही निर्णायक अवसर है। हिमाचल प्रदेश के लिए विकास समय की जरूरत है लेकिन साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के तौर पर जो कुछ बच गया है, उसे बचाए रखना भी। आर्थिक रूप से कमजोर होना पहाड़ी प्रदेश के विकास में बड़ी बाधा भी है। केंद्र सरकार की मदद और उधार के पैसे से लोगों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाने का प्रयास सभी सरकारों का रहा है। उसमें कुछ नया नहीं है। प्रदेश में उद्योगों का विस्तार उस तरह नहीं हो पाया है, जिस तरह से पड़ोसी राज्य उत्तराखंड या उत्तर-पूर्व के राज्यों में हो रहा है।

बेहतर सड़कें व रेलवे कनेक्टिविटी प्रदेश के लिए सबसे बड़ी समस्या है, जिसके कारण निवेशक यहां आने से हिचकते रहे हैैं। रेल नेटवर्क विस्तार भी उतना नहीं हो पाया। हवाई सेवा सीमित क्षेत्र तक ही सिमटी है। इन्वेस्टर्स मीट की सफलता से निश्चित तौर पर प्रदेश के विकास को पंख लगेंगे। रेल व हवाई सेवाओं के विस्तार के लिए केंद्र के हामी भरने का भी निवेशकों में अच्छा संदेश जाएगा। केंद्र सरकार के सकारात्मक प्रोत्साहन से उद्योगों को बेहतर सुविधाएं देने के प्रदेश सरकार के दावे को बल मिलेगा। केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष भी प्रदेश के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की जरूरत है ताकि वे प्रदेश की दिक्कतों को समझकर उनके हल की दिशा में प्रयास करें। यह किसी से छिपा नहीं है कि औद्योगिक पैकेज खत्म किए जाने के बाद से प्रदेश में औद्योगिक निवेश को लेकर ज्यादा प्रोत्साहन नहीं दिखा है।

कई उद्योगों ने यहां से पलायन कर लिया और कुछ बंद हो गए। अब प्रदेश सरकार ने नीतियों में संशोधन कर निवेशकों का भरोसा जीतने की कोशिश की है। सड़क, रेल व हवाई सेवाओं के विस्तार के लिए प्रदेश सरकार को मजबूती से केंद्र के समक्ष पक्ष रखना होगा। बड़े पैमाने पर होने वाले निवेश से प्रदेश की कई समस्याओं का हल होने की उम्मीद बंध रही है।

विपक्ष का काम कमियां गिनाना है। निंदकोंनजदीक रहना मुफीद होता है। लेकिन अभी इस सकारात्मक कदम के सफल होने की कामना करनी चाहिए। मंजूर हाशमी ने इरादों के हवाले से ही कहा होगा :

यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी लेकर चिराग जलता है

Posted By: Rajesh Sharma

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