धर्मशाला, नवनीत शर्मा। इस बीच.... जब मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल दिल्ली में हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल के रिक्त पदों पर चेहरों की उपयुक्तता पर वरिष्ठजनों के साथ चर्चा कर रहे हैं...। जब प्रदेशाध्यक्ष हाल में कह चुके हैं कि हिमाचल को केजरीवाल मॉडल नहीं चाहिए क्योंकि हिमाचली मुफ्तखोर नहीं हैं....ऐसे में हिमाचल प्रदेश मंत्रिमंडल के हालिया फैसले चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर 'शराब सस्ती और सीमेंट महंगा' के विरोधाभास को उभारते हुए व्यंग्योक्तियों का भरपूर सृजन किया जा रहा है।

दरअसल, नई आबकारी नीति आई है। प्रारूप को मंजूरी दी है मंत्रिमंडल ने। खबर यह है कि कुछ चुनिंदा बार और होटल रात के दो बजे तक शराब परोस सकेंगे। शराब सस्ती भी होगी। लक्ष्य यह है कि शराब सस्ती भी हो और अन्य राज्यों से तस्करी को रोका जा सके।

विसंगतियों को सुपरिभाषित न करने अथवा तार्किक ढंग से न देखने का नुकसान यह होता है कि सोच में अतिवाद जगह ले लेता है। कुछ ने शराबबंदी की बात भी की। सच यह है कि सरकारी खजाने के लिए शराब राजस्व का एक सदाबहार स्रोत है। शराबबंदी से होने वाले अनेक प्रकार के भ्रष्टाचार कोई रहस्य नहीं हैं। हिमाचल जैसे राज्य में, जिसकी भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं, संसाधन कम हैं, केंद्रीय मदद ही होने जीने का प्रमुख माध्यम है, शराब निस्संदेह आय का बड़ा स्रोत है।

वैसे भी सरकार किसी का खान-पान और पहरावा तय नहीं कर सकती। व्यावहारिक सत्य यह है कि जब शराब बिकती है तो मांस, नमकीन, फल आदि की खपत भी बढ़ती है...। इसलिए कोई बुराई नहीं। सरकार यह तो कर सकती है कि कितनी शराब पीकर गाड़ी नहीं चलानी चाहिए...हिमाचल जैसे रास्तों में यह हर तरह से जरूरी है। लेकिन रात को दो बजे तक शराब की उपलब्धता का क्या अर्थ है, यह समझ से बाहर है।

साथ ही सरकार को यह भी बताना चाहिए कि हिमाचल प्रदेश में बनने वाला सीमेंट हिमाचल में ही महंगा क्यों? जिस वस्तु से घर बनना है, सपनों का आशियाना बनना है, छत बननी है, हिमाचल में बनने वाले उसी सीमेंट की महंगाई पर भी सरकार को जवाब देना चाहिए। दूसरे शब्दों में एक तरफ यह सुविधा है कि रात को दो बजे तक उपलब्ध शराब पीकर सुबह देर से उठें। संदेश यह हो गया कि नैतिक निर्माण इस तरह कमजोर हो और भौतिक निर्माण सीमेंट के महंगे दामों के कारण कमजोर हो।

हिमाचल प्रदेश में कोई भी सरकार रही हो, किसी ने यह दम नहीं दिखाया कि सीमेंट से जुड़े सवालों के जवाब दे सके। कितने ही मुख्यमंत्री हुए, कितने ही उद्योग मंत्री हुए, कितने ही पहाड़ छिले, कितना ही पर्यावरण प्रदूषण हुआ...इस सवाल का जवाब नहीं मिल सका कि हिमाचल का सीमेंट हिमाचल प्रदेश में महंगा क्यों? बहुत सुशिक्षित माननीयों ने बहुत बड़े पदों को सुशोभित किया, सत्ता का केंद्र चाहे पालमपुर रहा हो या हमीरपुर, शिमला रहा हो या मंडी, सीमेंट का भाव इनकी पहुंच से बाहर रहा।

लोकसभा चुनाव से पहले 350 रुपये कीमत थी सीमेंट की एक बोरी की। अब 400 से पार है। क्यों? इस पर सरकार के निदेशक उद्योग आधिकारिक पक्ष देते हैं, 'सीमेंट के दाम पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। प्रदेश की कंपनियों से कहा गया है कि दाम कम करें।' सीमेंट के दाम पर सरकार का नियंत्रण नहीं है तो सरकार की भूमिका क्या है? हिमाचल प्रदेश के संसाधनों का इस्तेमाल करने वालों पर सरकार का नियंत्रण न होने की बात वास्तव में इस पंक्ति का चलताऊ अनुवाद है कि बाजार खुला है। तब भी...वे कौन से कर हैं जो केवल सीमेंट कंपनियों को बढ़ते दिखे और आम जनता को उनका पता नहीं है?

डीजल उछला न पेट्रोल तो महंगाई क्यों? आखिर क्यों सरकारें सीमेंट कंपनियों से बात करने में हिचकिचाती हैं? माननीयों की चुप्पी में ऐसी क्या मजबूरी है कि वे सीमेंट पर बात नहीं करना चाहते? दरअसल, खास आदमी यह नहीं जानते कि अब आम आदमी भी खनन निरीक्षक से लेकर ऊपर तक के रास्ते को समझने लगा है। सीमेंट बेंगलूरू और हैदराबाद में हिमाचल प्रदेश से सौ रुपये सस्ता मिले, इसके पीछे कोई गणित हो सकता है...लेकिन माननीय! थोड़ी रोशनी डालिए कि हरियाणा में जो सीमेंट की बोरी 375 रुपये में, पंजाब में 385 रुपये में मिलती है... वही हिमाचल में 410 रुपये की क्यों मिलती है? देहरा के एमएलए होशियार सिंह ने सीमेंट पर शोर मचाया था, अब शायद उन्हें भी चेताया गया और वे 'होशियार' हो गए हैं।

सरकार चाहे तो सब कर सकती है। सिरमौर के खनन पर जब किंकरी देवी के प्रयासों से सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगाया था तो एक व्यवस्था दी थी कि जो खनन किया जा चुका है, उस माल को उठाने की अनुमति है। व्यवस्था और शासन की चुस्ती देखिए कि दस साल तक पुराना ही माल उठता रहा। यानी जब भी पूछा जाता तो कहा जाता था, 'पुराना माल उठा रहे हैं।' किसी बहादुर अफसर ने इस निजाम को बदला था। काश किसी जनमंच में सीमेंट की कीमतें समस्या की तरह उठें और हल लेकर ही आएं। जवाब तो यह भी मिलना चाहिए कि शराब की एक बोतल पर एक रुपये का अधिभार बेसहारा पशुओं तक कितना पहुंचा? गर्मी और बरसात झेल कर, वाहनों से टकराने पर आकाश में सुराख करती रंभाहटें तो ऐसा नहीं बतातीं।

Posted By: Rajesh Sharma

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