नवनीत शर्मा। उद्देश्य बहुत अच्छा था...जीवन से जुड़ा था...! हर खूबसूरत कदम पहले उससे सुंदर विचार होता है। सोच के फलक से धरती पर जो जितने सलीके से पांव रखने का माहिर है, वही विचार को कदम में बदलता है।

हाल में भारत सरकार के आवास एवं शहरी मामले मंत्रालय के स्वच्छ सर्वेक्षण में यह साफ हुआ है कि हिमाचल प्रदेश का सम्मान बचाने में जतोग छावनी क्षेत्र ने जोर लगाया। जतोग के आगे हिमाचल प्रदेश देख कर जितना गर्व हुआ, उतना ही दुख हुआ शिमला को शीर्ष सौ में भी न देख पाना। राजधानी है। पहाड़ों की रानी है। सुप्रसिद्ध पर्यटन स्थल है लेकिन बस उतना साफ नहीं है कि अलंकृत हो सके। और धर्मशाला की तो बात ही क्या करें, जिसका इस सूची में ढूंढ़े से न मिलना ही एक बड़ा सच है।

शिमला 2014 में 14वें स्थान पर था लेकिन धीरे-धीरे खिसकता हुआ 144वें स्थान पर पहुंच गया और इस बार यह 128वें स्थान पर है। गंदगी हो या स्वच्छता, कुछ भी अकारण या अचानक नहीं होता। शिमला की महापौर ने कहा कि जिन दिनों सर्वेक्षण चल रहा था, मौसम खराब होने के कारण कचरे का सेग्रीगेशन नहीं हो पाया और शहर पिछड़ गया। दरअसल कचरे को छुपाना कचरे का निपटारा करना नहीं है। शिमला में मॉल रोड से मिडल बाजार होते हुए गलियां कहती हैं कि उनके दायें और बायें किसका साम्राज्य है। यह वही शिमला है, जो शहरों में स्वच्छता के लिए कभी शीर्ष पर भी रहा है। वास्तव में शहरों का विकास जब तक अपने आप में नियोजन को प्राथमिकता नहीं देता, तब तक नालियां मुंह बिसूरती रहेंगी... कूड़ेदान माननीयों के नामों समेत शीर्षासन की मुद्रा में दिखते रहेंगे...बेसहारा पशु शहर भर के किए-धरे में मुंह मारते रहेंगे...रोगों के शिकार होते रहेंगे।

शिमला और धर्मशाला से अपेक्षा इसलिए हो जाती है क्योंकि दोनों स्मार्ट सिटी में शामिल किए गए थे। एक राजधानी है तो दूसरा उसके बाद का सबसे महत्वपूर्ण शहर कहा जाता है। किसी भी घर में सफाई का पता या बिस्तरों और कोनों से लगता है, उसी प्रकार शहर की सफाई का पता शहर की ढंकी हुई गलियों से लगता है या फिर शहर में प्रवेश करने से पहले लगता है। अगर आप धर्मशाला में चड़ी की तरफ से प्रवेश करें तो मैक्लोडगंज बाईपास के पास कचरे का पहाड़ स्वागत में सुलगता रहता है। मजे की बात यह है कि प्राकृतिक और हरे पहाड़ों को चुनौती देते ये पहाड़ रोज सुलगते हैं। न ये बुझते हैं और न पूरी तरह जलते हैं। उस समय साहिर होशियारपुरी  याद आते हैं :

जिंदगी एक सुलगती सी चिता है साहिर

शोला बनती है न ये बुझके धुआं होती है

अगर यह सब हमारे स्मार्ट शहरों के हवाले आना है तो यह क्या आना हुआ? इतिहास में किसी भी शुरुआत के लिए कोई गिरोह नहीं आया है, कोई एक आधा जुनूनी आता है और अपने हिस्से का काम करके चला जाता है। 2014 में शुरू हुए स्वच्छता अभियान ने देश में सफाई के लिए एक चेतना तो भरी ही है। उस चेतना की बात हो रही है जो सुुबह इंदौर नगर निगम का गीत सुनाती हुई गाड़ी के आते ही भरती है...' गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल...!' सब निकालते हैं कचरा। सबको स्वच्छता के प्रति आग्रह है... कोई पड़ोसी के घर नहीं फेंकता लेकिन उस कचरे को निपटाने का अर्थ अगर उसका पहाड़ बना दिया जाना है तो यह बात मलाल देती है। इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि झाड़ू पकड़ कर शहर के नामी आदमी के साथ फोटो खिंचवाना और बात है, वास्तव में सफाई के लिए चौकस रहना, संस्थागत तरीके से उसका हल करना और बात है। कुछ जुनूनी पंचायतें हैं, जोश से भरे युवा प्रतिनिधि हैं जिन्होंने न केवल कचरे को समेटा बल्कि उसे पंचायत की आय का साधन भी बनाया।

कांगड़ा जिले की आईमा पंचायत एक बेहद सफल गाथा है जो सबके लिए नजीर हो सकती है। प्रधान संजीव राणा अब दूसरी जगहों पर जाकर भी अपना यही तरीका और उन्होंने सफलता कैसे पाई, यह बता रहे हैं। नायक हम सबके भीतर होता है लेकिन सच यह है कि खलनायक भी साथ ही होता है। दिल साफ रहे तो स्वच्छता वास्तव में दिखाई देगी। बस सरकारी महकमों को अपना काम ईमानदारी से करना होगा। नियोजन विभाग का अर्थ अगर नक्शे लटकाने से जुड़ता है तो क्यों, इससे आगे जाकर स्वास्थ्य, सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य, लोक निर्माण विभाग और शहरी विकास के साथ ग्रामीण विकास विभाग भी मिल कर बैठें, स्थानीय निकायों को जोड़ कर संयुक्त कार्यदल बनाएं, तो सब संभव है। पहले से खूबसूरत हिमाचल को खूबसूरत न बनाएं, लेकिन इसे मैला करना छोड़ दें, हल हो जाएगा। वरना तब तक ङ्क्षहदुस्तान के बड़े शायर स्वर्गीय पंडित तिलोकचंद महरूम इन पंक्तियों में गूंजते रहेंगे :  

मंदिर भी हमने साफ किए मस्जिदें भी साफ

मुश्किल ये है कि दिल की सफाई न हो सकी

Posted By: Rajesh Sharma

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