मंडी, हंसराज सैनी। कोरोना की पहली व दूसरी लहर में सबसे ज्यादा कमी खली वेंटीलेटर संचालन के लिए प्रशिक्षित स्टाफ की। अस्पतालों में वेंटीलेटर तो थे, लेकिन प्रशिक्षित स्टाफ नहीं था। कई अस्पतालों में वेंटीलेटर डिब्बों में ही पैक रहे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) मंडी के शोधकर्ताओं ने आटो ट्यून वेंटीलेटर बनाने के लिए कदम बढ़ा दिए हैं। इस संबंध में सफदरजंग अस्पताल व वर्धमान महावीर मेडिकल कालेज एवं अस्पताल दिल्ली के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर (एमओयू) किए हैं। दोनों चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ डाटा उपलब्ध करवाने में सहयोग करेंगे। यह वेंटीलेटर लगभग छह महीने में तैयार होने की संभावना है।

नहीं सताएगी वेंटीलेटर की चिंता

आटो ट्यून वेंटीलेटर मरीज, तीमारदार व चिकित्सकोंं को बड़ी राहत देगा। वेंटीलेटर ठीक से काम कर रहा है या नहीं, तीमारदार को अब इस बात की चिंता नहीं सताएगी। चिकित्सकों को वेंटीलेटर मानिटरिंग के लिए भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी। कोरोना जैसी महामारी में आटो ट्यून वेंटीलेटर चिकित्सा क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होगा। मेक इन इंडिया के अंतर्गत आइआइटी मंडी के शोधार्थियों ने कोरोना की प्रथम लहर के दौरान दो कम लागत के पोर्टेबल वेंटीलेटर भी विकसित किए थे। एक वेंटीलेटर की लागत 4,000 व दूसरे की 25,000 रुपये थी।

मरीज की होगी रियल टाइम मानिटरिंग

आटो ट्यून वेंटीलेटर उच्च सेंसर तकनीक से लैस होगा और यह मरीज की रियल टाइम मानिटरिंग करेगा। वेंटीलेटर मरीज के फेफड़ों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर रखेगा। मरीज के मानकों के हिसाब से स्वचालित बदलाव होगा। इससे वेंटीलेटर के संचालन के लिए मरीज की चिकित्सक पर निर्भरता पूरी तरह खत्म होगी।

घर व अस्पताल दोनों जगह होगा प्रयोग

यह वेंटीलेटर घर व अस्पताल दोनों जगह प्रयोग में लाया जा सकेगा। इससे चिकित्सा विशेषज्ञों पर काम का बोझ कम होगा। रियल टाइम मानिटरिंग होने से मरीज को वेंटीलेटर का सही संचालन न हो पाने से फेफड़े में लगने वाली चोट से निजात मिलेगी। वेंटीलेटर में नमी, तापमान नियंत्रण, किस गति से आक्सीजन देने की आवश्यकता है, किस प्रकार की आवश्यकता मरीज को है, आदि की सुविधा होगी।

अभी यह है स्थिति

चिकित्सा संस्थानों में वर्तमान में जो वेंटीलेटर उपलब्ध हैं, वे महंगे हैं। मरीज की स्थिति के अनुसार उनकी प्रक्रिया में अपने आप बदलाव नहीं होता है। अभी वेंटीलेटर टाइडल वाल्यूम यानी एक सामान्य सांस के दौरान फेफड़ों में जाने वाली और बाहर निकलने वाली आक्सीजन की मात्रा, प्रेरित आक्सीजन का अंश, आद्रता व वायुमार्ग का दबाव मरीज के श्वसन प्रवाह के अनुसार मानिटर नहीं कर पाते हैं। मैनुअल बदलाव के लिए फेफड़ों के विशेषज्ञों पर निर्भर रहना पड़ता है। जाहिर है, इससे चिकित्सकों के संक्रमित होने का खतरा बना रहता है। गौरतलब है कि महामारी की पहली लहर में कोरोना से 734 चिकित्सकों की मौत हुई थी।

आटो ट्यून वेंटीलेटर विकसित करने के लिए सफदरजंग अस्पताल व वर्धमान महावीर मेडिकल कालेज एवं अस्पताल, दिल्ली के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर (एमओयू) किए गए हैैं। इस वेंटीलेटर से मरीज, तीमारदार व चिकित्सकों को बड़ी राहत मिलेगी।

-डा. राजीव कुमार, एसोसिएट प्रोफेसर, स्कूल आफ इंजीनियरिंग, आइआइटी मंडी

आइआइटी मंडी की यह अच्छी पहल है। आटो ट्यून वेंटीलेटर से चिकित्सकों पर काम का बोझ कम होगा। मरीज की हालत की पल-पल निगरानी स्वचालित तरीके से संभव होगी।

-डा. राजेश भवानी, मेडिसिन विभागाध्यक्ष, लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कालेज एवं अस्पताल, नेरचौक, हिमाचल प्रदेश।

आटो ट्यून यानी पूरी तरह से स्वचालित वेंटीलेटर समय की मांग है। वर्तमान वेंटीलेटर में बहुत काम मैनुअल करना होता है। रियल टाइम मानिटरिंग होने से मरीजों को अच्छी सुविधा मिलेगी।

-डा. रेखा बंसल, विभागाध्यक्ष पल्मोनरी मेडिसिन, लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कालेज एवं अस्पताल, नेरचौक, हिमाचल प्रदेश

Edited By: Virender Kumar