धर्मशाला। Jagjit Singh Death Anniversary, साधना के सुर अपने में पिरोए है जगजीत सिंह की आवाज। इसमें वह शीतलता है जो ज्वालामुखी के दहकते अंगारों को भी शांत कर दे। वो आवाज जो कानों से होते हुए सीधे दिल के तारों को झंकृत करती है। आज जगजीत सिंह की पुण्यतिथि (10 अक्टूबर) पर उनको याद करता हुआ नवनीत शर्मा का आलेख...

स्मरण की भी एक संस्कृति होती है और स्मरण किए जाने वाले व्यक्ति के गुण इस संस्कृति के संस्कार का निर्धारण करते हैं। कभी केवल चेहरा याद आता है...कभी कुछ और बातें....और इसमें निजी अनुभव भी होते हैं जो सामूहिक ध्वनियां लिए होते हैं। जगजीत सिंह जब याद आते हैं तो बहुत याद आते हैं। क्यों? शायद इसलिए कि जगजीत की याद अपने साथ केवल ऐसा चेहरा ही नहीं लाती जिस पर संघर्ष और निजी दुखों ने बहुत कुछ लिखा पर वह मुस्कराता रहा, बल्कि यह भी याद आता है कि जगजीत सिंह ने कैसे शराब, शबाब तक अटकी गजल को हर आदमी के और परिष्कृत भावों से जोड़ा और इसमें उनके साथी बने उनकी आवाज, गजलों का चयन और सबसे बड़ी बात- साज। न केवल वाद्ययंत्रों में प्रयोग किए, नई राहें बनाईं बल्कि गजलों के चयन में मयखाना और जुल्फ इत्यादि से आगे बढ़कर उन गजलों को भी प्राथमिकता दी जो आम आदमी की अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और संघर्षों को संबोधित करती थीं। जगजीत ने ही गजल गायन को गायकी प्रधान वातावरण या शास्त्रीयता से मुक्त करवाया।

हर साज कहे भई वाह

मेंहदी हसन, बेगम अख्तर, फरीदा खानम के बारे में सोचें तो हारमोनियम की श्रुतियां गूंजती हैं, उदासी में अंगड़ाई लेती सारंगी गूंजती है या इनका गायकों का आलाप, लेकिन जगजीत क्योंकि हर बार चौंकाते थे, इसलिए उनकी मखमली और गहरी आवाज के साथ कोई भी साज याद आ सकता है। यह हवा से सुर लपकने वाली बांसुरी भी हो सकती है, यह तबला भी हो सकता है, जिस पर खुद नाचती अंगुलियां औरों को वाह कहने पर मजबूर कर दें। यह चोट खाकर हमेशा गुनगुनाता हुआ गिटार भी हो सकता है, सलीके से हाथ पड़ते ही झनझना उठने वाला सितार भी हो सकता है। यह साज और साजिंदे के मर्म को साझा अभिव्यक्ति देती हुई वायलिन भी हो सकती है। उनकी याद कभी-कभी हारमोनियम की मासूम श्रुतियों की शरारत भी साथ ले आती है...। एक बार विदेश में मंच पर आते ही कई भाषाओं में श्रोताओं का स्वागत किया और कहा... ‘बाजे पर हैं जगजीत।’

मन को पढ़ लेने वाला गायक

मूलत: ईरानी विधा गजल को हर व्यक्ति के दिल तक पहुंचाने के अलावा जगजीत ने वाद्य यंत्रों के चयन में भी प्रयोग किए। गजल के लिए गैर परंपरागत समझे जाने वाले वाद्य भी इस्तेमाल किए। यह सूची लंबी हो सकती है। ‘कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यों है’ जैसी नज्म के शुरू होने से पहले जिस गिटार की ध्वनि सुनने वाले के दिल में उथल-पुथल मचाती है, उसे नज्म के साथ शायद ही कोई सोच सकता था। डा. राही मासूम रजा ने जब ‘रंगों का रस्ता’ गीत लिखा तो उसमें ड्रीम सीक्वेंस वाला संगीत है। ऐसा संगीत अकेले तबले या हारमोनियम के बस का नहीं था। ‘हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चांद’ गाते-गाते जब चांद आंगन वाले नीम पर जाकर अटकता है, तब बांसुरी हमें बताती है कि किसी खास मौसम में कोयल ऐसे ही कूहू-कूहू करती है। शायरी ही नहीं, वाद्य यंत्रों के संदर्भ में भी जगजीत पहुंचे हुए मनोवैज्ञानिक थे। इंजीनियर तो ध्वनि व्यवस्था नियंत्रित करते होंगे, यह केवल जगजीत ही जानते थे कि कब कोई चुटकुला सुनाकर सुनने वाले को हंसाना है, कब उसे रुला देना है और कब उसे मजबूर करना है कि वह साथ ही गाने लगे...अंतत: यह भी पता नहीं कि कब सुनने वाले को वहीं बैठे-बैठे सुदर्शन फाकिर के जालंधर ले जाकर भांगड़ा करने पर आमादा कर देना है। इसी तरह फिराक गोरखपुरी की ‘रात भी नींद भी कहानी भी’ को गाया बेशक चित्रा जी ने है, लेकिन जगजीत सिंह का वाद्य चयन और स्वर रचना आरंभिक नोट्स नए गजल संगीत की परिभाषा गढ़ते हैं।

तकनीक के सच्चे पारखी

गाने का प्रशिक्षण लेकर गायक हुआ जा सकता है। जिन लोगों ने गाने का प्रशिक्षण नहीं लिया, वे भी किशोर कुमार और एस.पी. बालासुब्रमण्यम हुए। गाने के साथ ही परफार्मर होने की कला सीखी या सिखाई नहीं जा सकती। ‘याद नहीं क्या-क्या देखा था, सारे मंजर भूल गए’ इस गजल में, ‘खूब गए परदेस कि अपने दीवार-ओ-दर भूल गए’ इस शेर की यह पंक्ति गाकर वह दीपक पंडित की वायलिन से कुछ करने को कहते हैं। तब वायलिन ऐसा नास्टेल्जिक नोट बजाती है कि आदमी अपनी जड़ों तक पहुंच जाए। उसके बाद शेर पूरा होता है-‘शीश महल ने ऐसा घेरा, मिट्टी के घर भूल गए’ सुनने वाले की आंखों के कोर भीग न जाएं, असंभव है। तकनीक के साथ दोस्ती ऐसी कि भारत को पहली डिजिटली रिकार्डेड आडियो कैसेट ‘बीयांड टाइम’ के रूप में जगजीत ही दे सके।

अमर कर गए उन नज्मों को

आजादी के बाद अगर किसी भारतीय गायक ने गजल ही नहीं बल्कि नज्म गायकी को भी नया अंदाज दिया तो वह जगजीत ही थे। गजल का हर शेर स्वतंत्र होता है जबकि नज्म पूरी तरह गुंथी होती है और एक ही विषय पर टिकी रहती है। ‘बात निकलेगी तो फिर’, ‘तेरे खुशबू में बसे खत’, ‘जब नहीं आए थे तुम’, ‘बहुत दिनों की बात है’ जैसी कई नज्में हैं जिन्हें जगजीत ही गा सकते थे। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उनके साजों का चयन था। नज्म को उन्होंने कई आधुनिक वाद्य यंत्रों के साथ इस तरह निभाया कि वे अमर कलाकृतियां बन गईं। कहां निदा फाजली के दोहे और कहां स्पेनिश गिटार, लेकिन यही तो जगजीत होना है। वही निदा फाजली, जिनकी जन्मतिथि भी इसी सप्ताह 12 अक्टूबर को है।

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