धर्मशाला, मुनीष गारिया। कश्मीर से लेकर नेपाल तक हिमालयन रेंज की टेक्टोनिक प्लेटों में क्या बदलाव आ रहे हैं। कहां इनकी हलचल ज्यादा या कम हुई है। प्लेटों की गति में कमी से किस क्षेत्र में भूकंप आ सकता है और इसकी तीव्रता कितनी होगी, इसका जल्द पता चलेगा। यह सब संभव होगा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयू) के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस व इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग (आइआइआरएस) देहरादून की बदौलत। दोनों संस्थानों के संयुक्त प्रयासों से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के नूरपुर और पालमपुर के तहत जिया गांव में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम स्थापित किया जाएगा। करीब तीन करोड़ रुपये के बजट वाले इस प्रोजेक्ट के पहले चरण के लिए मशीनरी देहरादून पहुंच चुकी है और अगले हफ्ते दोनों जगह पर इसे स्थापित कर दिया जाएगा।

हिमालयन रेंज की टेक्टोनिक प्लेटों की गति भारत के अन्य स्थानों की प्लेटों से कम है। अगर जिला कांगड़ा की बात की जाए तो यहां ये प्लेटें 14 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की रफ्तार से गतिशील हैं, जबकि नेपाल व कश्मीर में 11 व 20 मिलीमीटर प्रतिवर्ष से गति कर रही हैं। ऐसे में ये क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील हैं। इन प्लेटों की गति का अध्ययन करने के लिए अभी तक स्थायी रूप से कोई सिस्टम स्थापित नहीं है।

पहले चरण में लगेंगी 30 लाख की मशीनें

प्रोजेक्ट के पहले चरण में नूरपुर व जिया में 30 लाख रुपये की मशीनें लगेंगी। सिस्टम को स्थापित करने के लिए जिला प्रशासन ने एनओसी दे दी है। मशीनें लगाने का उद्देश्य टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल का पता लगाना है। अध्ययन करने के लिए मशीनों का फासला कम से कम 20 किलोमीटर होना चाहिए।

सीयू के डॉ. अबरीश महाजन होंगे समन्वयक

दोनों केंद्रों से ऑनलाइन मिलने वाले अपडेट का अध्ययन करने और केंद्रों के संचालन का जिम्मा केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लाइफ साइंस डीन एवं भूगर्भ वैज्ञानिक डॉ. अबरीश महाजन के हवाले होगा। वे केंद्रों के समन्वयक भी होंगे। 

आइआइआरएस देहरादून के साथ मिलकर सिस्टम स्थापित करने और इसकी देखरेख की जिम्मेदारी सीयू प्रशासन ने डॉ. अबरीश महाजन को दी है। जल्द सिस्टम स्थापित हो जाएगा।

-डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, कुलपति केंद्रीय विश्वविद्यालय

क्या हैं टेक्टोनिक प्लेटें

टेक्टोनिक प्लेटें पृथ्वी की बाहरी सतह और ऊपर की ओर के टुकड़े होते हैं और इन्हें लिथोस्फीयर कहा जाता है। प्लेटें करीब 100 किमी मोटी होती हैं और ये दो प्रकार की होती हैं। पहली समुद्री क्रस्ट और दूसरी कॉन्टिनेंटल क्रस्ट। प्लेटें स्थलमंडल के नीचे स्थित दुर्बलतामंडल के ऊपर तैर रही हैं। इसके घूमने की गति और टूटने की प्रवृत्ति से ही भूंकप होता है। जिस क्षेत्र में प्लेटों की गति कम होती है वहां भूंकप की आशंका बढ़ जाती है।

भूकंप की दृष्टि से संवदेनशील क्षेत्र 

जम्मू-कश्मीर का सांबा, हिमाचल का कांगड़ा, धर्मशाला, मैक्लोडगंज, मंडी, कुल्लू, चंबा, सोलन, उत्तराखंड व नेपाल।

1905 के भूकंप में मारे गए थे हजारों लोग

4 अप्रैल 1905 को कांगड़ा जिले में भूकंप आया था और इसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.8 मापी गई थी। उस समय मरने वालों का आंकड़ा 19800 पहुंचा था और एक लाख भवन तबाह हो गए थे। 

मशीनें देहरादून पहुंच चुकी हैं और अगले हफ्ते विशेषज्ञ मशीनें लेकर आएंगे और नूरपुर व जिया में इन्हें स्थापित करेंगे। जीपीएस स्थापित होने के बाद टेक्टोनिक प्लेटों की स्थिति और भूकंप की जानकारी मिल जाएगी।

-डॉ. अबरीश महाजन, डीन स्कूल ऑफ लाइफ साइंस सीयू धर्मशाला 

 

Posted By: Babita

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