शिमला, जेएनएन। हिमाचल में 15 मई 2003 के बाद सरकारी नौकरी में आए कर्मचारियों को पुरानी पेंशन नहीं मिलेगी। ऐसे करीब 80 हजार कर्मचारी हैं। इन्हें अब न्यू पेंशन स्कीम से ही संतोष करना पड़ेगा। वीरवार को सदन में यह मुद्दा प्रमुखता से गूंजा। वामपंथी विधायक कामरेड राकेश सिंघा ने इस संबंध में सवाल उठाया। उन्होंने सरकार की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाया। एक विधान वाला नियम हिमाचल में भी लागू करने की मांग की। इसके जवाब में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने साफतौर पर कहा कि प्रदेश के आर्थिक संसाधन पुरानी पेंशन बहाल करने की इजाजत नहीं देते। उन्होंने नई पेंशन स्कीम (एनपीएस) के बहाने पूर्व कांग्रेस सरकार को घेरा। कहा कि भारत सरकार ने एनपीएस 2004 में लागू किया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने हिमाचल में इसे 2003 में लागू किया था। पश्चिम बंगाल को छोड़कर देश के सभी राज्यों में यह नई पेंशन ही लागू है।

बंगाल के हालात यह हैं कि वहां कर्मचारियों को आधी तनख्वाह दी जाती है। इसकी तुलना में हिमाचल देश के उन राज्यों में शुमार है, जहां कर्मचारियों को सबसे बेहतर वेतन मिलता है। जयराम ठाकुर ने कहा कि कर्मचारियों को और वित्तीय लाभ देने की सरकार की भावना भी है और संवेदनशीलता भी, लेकिन संसाधन सीमित हैं। राज्य में करों और गैर करों से सालाना आय 10 हजार करोड़ होती है, जबकि वेतन और पेंशन पर 19 हजार करोड़ खर्च होते हैं। प्रदेश पेंशन को लेकर केंद्र से जुड़ा है, जबकि वेतनमान के मामले में पंजाब पैटर्न का अनुसरण करते हैं। केंद्र का पेंशन पैटर्न 1972 से लागू है, लेकिन दोनों ही पैटर्न हिमाचल को अपनाना अनिवार्य नहीं है। प्रदेश पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। अपने संसाधन देखकर ही इस दिशा में आगे बढ़ा जाता है।

राज्य सरकार ने एनपीएस कर्मचारियों के लिए इस साल 22 अप्रैल से सरकारी अंशदान में चार फीसद की बढ़ोतरी की। यह 10 से 14 फीसद तक हो गई है। इससे सरकार के खजाने पर सालाना 175 करोड़ का बोझ पड़ा है। अगर भविष्य में केंद्र पेंशन नियम में बदलाव करता है तो ग्रेच्युटी जैसे लाभों, हादसे में 40 फीसद विकलांग होने पर पूरी पेंशन, ड्यूटी के दौरान मौत होने पर आश्रित को पेंशन देने पर विचार होगा। सेवानिवृत्त कर्मियों को ग्रेच्युटी लाभ 2018 से दिए हैं।

Posted By: Rajesh Sharma

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