मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

नवनीत शर्मा, धर्मशाला। धर्मदास की धर्मशाला से धर्मशाला हो चुके शहर में दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट टीम पहुंच चुकी है। जाहिर है, भारत-दक्षिण अफ्रीका क्रिकेट मैच के बहाने इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम फिर शहर को रोशन करेगा। 15 सितंबर के मैच के लिए उतना ही जुनून है जितना है, जितना एक छोटे शहर में बड़े क्रिकेट मैच के लिए होना चाहिए। खेल बहुत मजेदार है। सबको पता है कि दोनों कप्तान कौन हैं... गेंदबाजी कौन करेगा... कौन बल्लेबाज हैं..। क्रिकेट मैच तो रविवार को हो जाएगा लेकिन इस बीच धर्मशाला उपचुनाव वाले राजनीतिक मैच के लिए भी पिच तैयार हो रही है।

इस मैच के अंपायर पटना से आकर एक बार जायजा ले गए हैं। बिहार के स्वास्थ्य मंत्री और हिमाचल प्रदेश भाजपा प्रभारी मंगल पांडेय। मजे की बात यह है कि वह कांगे्रस बनाम भाजपा उपचुनाव के अंपायर नहीं हैं, उन्हें भाजपा बनाम कुछ और भाजपा के मैच में व्यवस्था देनी है। क्योंकि पार्टी प्रभारी हैं इसलिए उनकी राय महत्वपूर्ण होगी। समय उनका भी कीमती है क्योंकि वह रोज-रोज बिहार जैसे बड़े राज्य की नब्ज छोड़कर घरेलू मैच की अंपायङ्क्षरग करने आने से तो रहे।

इस प्रसंग की पूर्वपीठिका उतनी सीधी नहीं है। बंटे होने की जो बातें कुछ वर्ष पूर्व तक या अब भी कांग्रेस के बारे में कही जा सकती हैं, अब भाजपा के बारे में उठ रही हैं। ऐसा मुकाबला है जिसमें कुछ अदृश्य अहंकार टकरा रहे हैं, चेहरे सामने होते हुए भी सामने नहीं हैं। बात धर्मशाला से इसलिए उठ रही है क्योंकि यह सबसे बड़े और अहम जिले कांगड़ा का मुख्यालय है। इसका असर प्रदेश की राजनीति पर पड़ता है। यह वही जिला है, सरकार बनाने के लिए जिसके बिना शिमला की ओर नहीं देखा जा सकता। 2012 में यह प्रमाण सामने भी आ गए थे। पंद्रह विधायक जाते हैं विधानसभा में। खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री किशन कपूर सांसद बन गए तो उपचुनाव होना ही है। कभी एक नाम चला तो कभी दूसरा। और तो और, धर्मशाला से प्रेम कुमार धूमल का नाम भी चला। लेकिन उन्होंने न हामी भरी, न खंडन किया।

शांता कुमार की पसंद भी जगजाहिर है। विद्यार्थी परिषद से भी कुछ नाम चले हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर कुछ दिन पहले शांता कुमार से मिले। उसी दिन दोनों नेता कुछ देर लिफ्ट में भी फंसे। बताया गया कि 'बोझ' अधिक हो गया था। जाहिर है, केवल शांता कुमार और मुख्यमंत्री ही होते तो बोझ नहीं होता। लेकिन यही सच्चाई है। देर रात उन्होंने सक्रिय राजनीति छोडऩे की घोषणा को ट्वीट कर दिया। बाद में बाकायदा विज्ञप्ति जारी की कि वह धर्मशाला उपचुनाव में सक्रिय रहेंगे। साथ ही यह भी कहा कि उनका कोई प्रत्याशी नहीं होगा। इससे पूर्व इसी जिले से इंदू गोस्वामी प्रकरण हुआ था जब उन्होंने प्रदेश महिला मोर्चा अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था।

पहले तो उसका संज्ञान नहीं लिया गया, बाद में आनन-फानन स्वीकार कर लिया गया। सवाल तब भी उठे थे, बल्कि कुछ तो अनुत्तरित भी हैं। उसके साथ ही ज्वालामुखी के विधायक रमेश धवाला के खिलाफ एक प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री के समक्ष गुहार लगाने पहुंचा। बाद में संगठन और रमेश धवाला के बीच ऐसा बयानयुद्ध छिड़ा जो भाजपा की परंपरा से मेल नहीं खाता। अब पालमपुर में शांता कुमार, स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार, उद्योग मंत्री बिक्रम ठाकुर और स्वयं मुख्यमंत्री से तीखे सवाल पूछने वाला पत्र सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया गया। पुलिस की जांच पूर्व मंत्री रविंद्र रवि तक पहुंची। उनका फोन भी लिया गया। संभवत: पूछताछ भी होगी।

इस सारी कवायद में कोई ठीक हो सकता है, कोई गलत। लेकिन जांच के नश्तर जहां भी चलेंगे, सिसकी भाजपा की ही निकलेगी, चेहरों का क्या है, वे तो अपना प्रबंध कर ही लेते हैं। यह त्रिगर्त यानी कांगड़ा की दीवारों की सूरत है। यह सब कुल मिलाकर मुख्यमंत्री की परीक्षा है। अब कांग्रेस से सुधीर शर्मा अपनी दावेदारी लेकर हाजिर हैं। लेकिन भाजपा को अभी अपना चेहरा तलाश करना है। चार अहम लोगों को जिम्मेदारी बांट दी गई है। सत्ता का साथ है, कोई बड़ा संकट भी नहीं है, मुख्यमंत्री भी सबको उपलब्ध हैं, इसके बावजूद घोर असमंजस क्यों? केवल एक चेहरे के लिए इतना असमंजस? क्या इस असमंजस और एक के बाद एक चिंगारी के पीछे कोई 'ज्वालामुखी' है? यह भाजपा को अवश्य सोचना चाहिए। मैच चेहरों के साथ होता है, पारदर्शिता के साथ होता है।

सपनों को रगड़ : सपने ऐसी चीज हैं जिन्हें बेचना और खरीदना सबको अच्छा लगता है। लेकिन जब सपने के साथ कीमत जुड़ जाती है तो अपनी आर्थिक स्थिति को कोई भी समझदार व्यक्ति देखता है। हिमाचल प्रदेश की जनता ने ऐसा ही महसूस किया। केंद्रीय वित्त एवं कंपनी मामले राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने हाल में शिमला में कहा कि ऊना से हमीरपुर तक रेललाइन के लिए सर्वेक्षण पूरा हो चुका है। डीपीआर बन चुकी है। अब राज्य सरकार ने रेल मंत्रालय के पत्र का जवाब देना है। अगले दिन, हिमाचल के प्रधान सचिव परिवहन ने साफ कहा कि रेलवे को जवाब दिया जा चुका है कि इस परियोजना में हिमाचल अंशदान देने की स्थिति में नहीं है। क्या रेललाइन पर केंद्र पूरा पैसा खर्च करेगा? या फिर यह योजना ब्रॉडगेज पठानकोट-जोगेंद्रनगर रेल मार्ग की तरह दूर का ढोल है? ये सवाल इतना दम तो रखते ही हैं कि हिमाचल जागे और अपने संसाधन जुटाए।

Posted By: Rajesh Sharma

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