आयुर्वेद पद्धति से डायबिटीज मरीजों का उपचार, हिमाचल में 12000 लोगों ने मर्म और लीच थैरेपी से ली राहत
हिमाचल के पपरोला स्थित राजीव गांधी राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज में मर्म और लीच थैरेपी से 12,000 से अधिक रोगियों को लाभ मिला है।

आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल पपरोला के प्राचार्य डॉ. विजय चौधरी व महिला का उपचार करते चिकित्सक। जागरण
HighLights
पपरोला में 12,000 रोगियों को मर्म-लीच थैरेपी से लाभ।
मर्म चिकित्सा पुराने दर्द, लीच मधुमेह घावों में प्रभावी।
जोंक की लार व प्रजनन पर आईआईटी संग शोध जारी।
मुनीष दीक्षित, बैजनाथ (कांगड़ा)। आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां आधुनिक दौर में भी रोगियों को राहत पहुंचा रही हैं। राजीव गांधी राजकीय आयुर्वेदिक कालेज एवं अस्पताल पपरोला में मर्म और लीच (जोंक) थैरेपी से रोगियों का उपचार करने के साथ शोध कार्य भी किया जा रहा है। लंबे समय से दर्द से परेशान रोगी मर्म चिकित्सा का लाभ उठा रहे हैं, जबकि डायबिटीज के कारण होने वाले कुछ जख्मों और त्वचा से संबंधित समस्याओं में लीच थैरेपी से उपचार किया जा रहा है।
अब तक 12,000 रोगी दोनों थैरेपी का लाभ उठा चुके हैं। मर्म थैरेपी से 9000 और लीच थैरेपी से 3000 रोगियों का उपचार किया जा चुका है।
मर्म थैरेपी पर हो रहा काम
अस्पताल के शल्य तंत्र विभाग में 2019 से मर्म थैरेपी पर काम हो रहा है। इससे शरीर के 107 मर्म बिंदुओं के जरिए उपचार किया जाता है। पीठ और कंधों के दर्द, लंबे समय से चले आ रहे सिरदर्द तथा माइग्रेन से परेशान मरीज यहां पहुंचते हैं। मर्म चिकित्सा का उल्लेख आयुर्वेदिक ग्रंथ सुश्रुत संहिता में मिलता है। समय के साथ यह पद्धति कम प्रचलित हुई, लेकिन पपरोला में इसे फिर से चिकित्सा व्यवहार में लाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
यह एक्यूप्रेशर से कुछ समानता रखती है, हालांकि दोनों की तकनीक और उपचार के सिद्धांत अलग हैं। मर्म चिकित्सा में शरीर के विशिष्ट बिंदुओं पर नियंत्रित दबाव दिया जाता है।
लीच थैरेपी से भी मरीजों का उपचार
मर्म एवं अनुशस्त्र कर्म ओपीडी में मर्म के साथ लीच थैरेपी से भी मरीजों का उपचार किया जाता है। अगस्त 2026 तक 3000 रोगी लीच थैरेपी का लाभ उठा चुके हैं। अस्पताल में 143 जोंक हैं, जिन्हें आगरा और बिहार से मंगवाया जाता है। संस्थान में जोंक के प्रजनन पर भी काम हो रहा है, ताकि भविष्य में उनकी उपलब्धता बढ़ाने की संभावनाएं तलाशी जा सकें।
आइआइटी और वेटरनरी कॉलेज के सहयोग से शोध
दोनों पद्धतियों को उपचार तक सीमित न रखकर उनके वैज्ञानिक पहलुओं को समझने का प्रयास भी हो रहा है। आइआइटी मंडी और वेटरनरी कालेज पालमपुर के सहयोग से जोंक की लार में मौजूद तत्वों के संभावित चिकित्सकीय उपयोग और उनके प्रजनन पर शोध शुरू किया गया है। इसके निष्कर्षों से जोंक चिकित्सा की संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिल सकती है। चिकित्सकीय प्रभावों की पुष्टि वैज्ञानिक शोध के निष्कर्षों के आधार पर ही होगी।
मर्म थैरेपी के जरिए पुराने दर्द से परेशान मरीजों को राहत देने के लिए काम किया जा रहा है। लीच थैरेपी से भी उपचार किया जाता है और जोंक की लार तथा उनके प्रजनन पर शोध आगे बढ़ाया जा रहा है। दोनों थेरेपी में करीब दो महीने तक हर हफ्ते एक-एक सीटिंग लेनी पड़ती है। अगर रोग अधिक है तो कुछ और दिन लग सकते हैं।
-डा. गौरव परमार, आयुर्वेदिक कालेज एवं अस्पताल पपरोला।
शोध कार्य जारी
अनेक मरीज मर्म और जोंक चिकित्सा का लाभ उठा रहे हैं। संस्थान में इन पद्धतियों के चिकित्सकीय उपयोग की संभावनाओं को समझने के लिए शोध कार्य भी जारी है।
-डा. विजय चौधरी, प्राचार्य एवं डीन आयुर्वेदिक कालेज एवं अस्पताल पपरोला।
केस स्टडी
मुझे काफी वर्ष से गर्दन में दर्द रहता था। कई स्थानों में दिखाया, दवाएं खाई एक्सरे करवाया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। मर्म थैरेपी की जानकारी मिली और पपरोला आयुर्वेदिक अस्पताल में इलाज करवाया। बिना दवा के काफी राहत मिली है।
-सीमा शर्मा, घाड़, पालमपुर।
मेरी उम्र 70 साल है। एक टांग में काफी समय से जख्म था। इसकी भरपाई नहीं हो पा रही थी। काफी दवाएं भी खाई, लेकिन फर्क नहीं पड़ा। अब लीच थैरेपी की मदद ली। इससे मुझे काफी लाभ मिला है।
-जीवानंद, लडभड़ोल, मंडी।
