प्रतिनिधि, नादौन : जनरल जोरावर सिंह महान योद्धा, कुशल प्रशासक व साहसी ही नहीं बल्कि धर्म परायण व स्वामीभक्त भी थे। वह दूरदृष्टि रखते थे। 13 अप्रैल को जनरल जोरावर सिंह की जयंती मनाई जाएगी।

जनरल जोरावर सिंह की दूरदृष्टि का अनुभव इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें लगभग 200 वर्ष पूर्व उत्तरी सीमा से भारत को खतरे का आभास हो गया था। उन्होंने सीमा विस्तार मैदानी क्षेत्रों की तरफ करने के बजाए दुर्गम भू-भाग की ओर अभियान शुरू किया। इस महान योद्धा की वीरता के परिणामस्वरूप लद्दाख आज भारत का हिस्सा है। इस महान सेनानायक ने अपने सैन्य कौशल से लद्दाख, वहिस्तान व सुर्कुद जैसे दुर्गम क्षेत्रों को जीतकर जम्मू रियासत में 70 लाख 30 हजार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को मिलाया। जोरावर सिंह अपने चार हजार सैनिकों के साथ 19 हजार फुट ऊंचे ग्लेशियरों को पार करके छह दिन में लेह पहुचे थे। जोरावर सिंह का जन्म 13 अप्रैल 1786 को चंद्रवशी राजपूत हरजे सिंह ठाकुर के घर गाव अन्सरा मौजा हथोल, नादौन (हमीरपुर) में हुआ। उनके पिता कहलूर बिलासपुर रियासत के दरबारी थे। गाव में भूमि विवाद के लिए हुए झगडे़ के कारण वह घर छोड़कर हरिद्वार चले गए। लाहौर के शासक रणजीत सिंह व कागडा के राजा संसार चंद की सेनाओं में सेवा करने के बाद वह जम्मू चले गए। वहा पर उनकी भेंट महाराजा गुलाब सिंह से हुई। गुलाब सिंह ने उनसे प्रभावित होकर उन्हें रियासी क्षेत्र का प्रबंधन सौंपा। 1822 ई. में उन्हे किश्तवाड़ का गवर्नर नियुक्त किया गया। उन्होंने सेना को प्रशिक्षित किया व 1834 ई. में चार हजार सैनिकों के साथ किश्तवाड़ के रास्ते आगे बढ़ते हुए सुरू व सोड़ के किलों को अपने अधीन किया। उन्होंने लद्दाख के राजा ग्यालयो त्सेपाल नामग्याल से लेह की संधि कर 50 हजार रुपये जुर्माना वसूला व वार्षिक कर देने के लिए मजबूर किया। उन्होंने चतरगढ़ पर चढ़ाई की व उसका नाम गुलाबगढ़ रखा। उन्होंने वल्लिस्तान को अपने अधीन किया। मई 1841 में जोरावर सिंह तिब्बत विजय के लिए निकले। वह पांच हजार योग्य प्रशिक्षित सैनिकों को लेकर लेह से आगे बढ़े। उन्होंने ताशीगोज व हानले को पार करके सडोक व गार को अपने अधीन किया। जोरावर ने मानसरोवर व रादासताल के समीप हुए युद्ध में तिब्बतियों को पराजित कर मानतलाई का झंडा छीन लिया। इसके बाद जोरावर सिंह तोन्यू के निकट तिब्बतियों की 10 हजार सेना से भिड़ गए। अभी निर्णायक लड़ाई चल रही थी कि 12 दिसंबर 1841 को उन्हें गोली लग गई। अदम्य वीरता का परिचय देते हुए वह तलवार से लड़ते रहे तभी एक भाला पीछे से उन्हे लगा। शत्रुओं ने उन्हे घेर लिया व उन्हे शहादत प्राप्त हुई। जोरावर सिंह की वीरता से प्रभावित होकर तिब्बतियों ने व्यू नामक स्थान पर उनकी समाधि बनाई। जनरल जोरावर सिंह महाविद्यालय धनेटा में इतिहास के सहायक प्रोफेसर राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि विश्व के इतिहास में जनरल जोरावर सिंह जैसा महान योद्धा नहीं हुआ है जिनके अदम्य साहस व वीरता का लोहा मानते हुए दुश्मनों ने जिनकी समाधि बनाई हो।

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