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मेजर मनकोटिया पंचतत्व में विलीन: हिमाचल की राजनीति के लंबे अध्याय का अंत, उसूल ऐसे कि ठुकरा दिया था मंत्री पद

By Digital Desk Edited By: Rajesh Sharma
Published: Wed, 30 Sep 2026 01:48 PM (IST)

मेजर विजय सिंह मनकोटिया का निधन हो गया, जिससे हिमाचल प्रदेश की राजनीति के एक लंबे और बेबाक अध्याय का ...और पढ़ें

HighLights

  1. 1982 में शाहपुर से निर्दलीय विधायक बने, मंत्री पद ठुकराया।

  2. मुख्यमंत्री रामलाल ठाकुर के खिलाफ शाहपुर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व।

  3. धर्मशाला में विधानसभा शीतकालीन सत्र की शुरुआत में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका।

जागरण टीम, धर्मशाला। मेजर विजय सिंह मनकोटिया पंचतत्व के विलीन हो गए। तियारा में उनके आवास कई नेताओं व समर्थकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनके निधन से हिमाचल प्रदेश की राजनीति के एक लंबे अध्याय का अंत हो गया। सेना में अधिकारी के रूप में देशसेवा करने के बाद वर्ष 1982 में राजनीति में आए मनकोटिया ने करीब चार दशक के सार्वजनिक जीवन में शाहपुर के साथ कांगड़ा की राजनीति में भी अलग पहचान बनाई।

और ठुकरा दिया था मंत्री पद

पूर्व पंचायत समिति अध्यक्ष एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता ओंकार सिंह राणा के अनुसार, मनकोटिया ने ताउम्र लोगों की सेवा को प्राथमिकता दी और जनता के हितों से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात खुलकर रखी। उनके राजनीतिक जीवन के कई प्रसंग उनकी बेबाक शैली की याद दिलाते हैं। वर्ष 1982 में मनकोटिया पहली बार आजाद उम्मीदवार के रूप में शाहपुर से विधानसभा चुनाव जीते। उस समय प्रदेश में कई निर्दलीय विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। सरकार के गठन के दौरान निर्दलीय विधायकों के समर्थन की जरूरत थी।

बताया जाता है कि छह निर्दलीय विधायकों ने सरकार को समर्थन दिया, लेकिन मनकोटिया ने मंत्री पद का प्रस्ताव ठुकरा दिया। उनका कहना था कि शाहपुर की जनता ने उन्हें आजाद प्रत्याशी के रूप में चुना है और वह मतदाताओं के विश्वास के साथ समझौता नहीं कर सकते। उनके इस फैसले ने क्षेत्र में उनकी अलग राजनीतिक छवि बनाई।

जब मुख्यमंत्री की सभा में लगे गो बैक के नारे

मनकोटिया की लोकप्रियता का चर्चित प्रसंग वर्ष 1983 से जुड़ा है। तत्कालीन मुख्यमंत्री रामलाल ठाकुर जब शाहपुर में जनसभा करने पहुंचे थे तो उनके विरोध में नारेबाजी शुरू हो गई। समर्थकों की भीड़ ने मुख्यमंत्री के खिलाफ गो बैक के नारे लगाए। स्थिति बिगड़ने पर मुख्यमंत्री को पुलिस सुरक्षा के बीच सभा स्थल से जूते मंच पर छोड़कर नंगे पांव निकलना पड़ा था। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस दौरान मनकोटिया ने शाहपुर बाजार में जितेंद्र महाजन की दुकान की छत पर चढ़कर लाउडस्पीकर के माध्यम से समर्थकों से शांत करने की अपील की थी। इसके बाद पुलिस सुरक्षा में मुख्यमंत्री को वहां से निकाला। यह घटना लंबे समय तक शाहपुर की राजनीति में चर्चा का विषय रही।

धर्मशाला में विधानसभा के लिए उठाई आवाज

मेजर मनकोटिया का मानना था कि कांगड़ा, चंबा, ऊना और हमीरपुर सहित निचले हिमाचल के विकास के लिए क्षेत्र में सरकार और प्रशासन से जुड़े महत्वपूर्ण संस्थानों की मौजूदगी जरूरी है। इसी सोच के तहत उन्होंने धर्मशाला में विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित करने की मांग को लगातार उठाया। दिसंबर 2005 में धर्मशाला कालेज के प्रयास भवन में पहला शीतकालीन विधानसभा सत्र आयोजित हुआ और दिसंबर 2006 में तपोवन स्थित विधानसभा परिसर में विधानसभा का सत्र चला। धर्मशाला में विधानसभा की शुरुआत को लेकर मनकोटिया की भूमिका भी राजनीतिक चर्चा का विषय रही। उन्होंने इस मुद्दे को विधानसभा के भीतर और सार्वजनिक मंचों पर प्रमुखता से उठाया था।

कांगड़ा के मुद्दों पर रहे मुखर

मनकोटिया ने धर्मशाला को दूसरी राजधानी का दर्जा देने, तपोवन में विधानसभा के शीतकालीन सत्र की अवधि बढ़ाने, कांगड़ा हवाई अड्डे के विस्तार और पर्यटन सुविधाओं को मजबूत करने जैसे मुद्दे भी उठाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ उनके राजनीतिक मतभेद भी कई बार सार्वजनिक हुए। सत्ता पक्ष में रहने के दौरान भी उन्होंने अपनी बात रखने से परहेज नहीं किया।

भ्रष्टाचार के आरोपों पर उठाए थे सवाल

वर्ष 1987 में तत्कालीन परिवहन मंत्री सत महाजन पर भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों का मुद्दा उठा। मनकोटिया ने आरोपों को राजनीतिक रूप से उठाते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से मंत्रिमंडल के सदस्यों की संपत्तियों की जांच की मांग की थी। इसके बाद सत महाजन की ओर से मनकोटिया के खिलाफ पठानकोट में मुकदमा दायर किए जाने की बात सामने आती है। बताया जाता है कि उस समय पठानकोट में कोई भी वकील मनकोटिया के खिलाफ केस लड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ। यह प्रसंग भी उनकी बेबाक राजनीतिक छवि से जुड़े चर्चित किस्सों में शामिल रहा।

चार दशक की राजनीति में नहीं बदला अंदाज

मेजर विजय सिंह मनकोटिया का राजनीतिक सफर केवल चुनाव जीतने और मंत्री पद संभालने तक सीमित नहीं रहा। सैन्य पृष्ठभूमि से राजनीति में आए मनकोटिया ने करीब चार दशक तक कांगड़ा की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई। सत्ता में रहे तो सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए और विपक्ष में रहे तो जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनके निधन के साथ हिमाचल की राजनीति ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसकी पहचान सैन्य पृष्ठभूमि, लंबी राजनीतिक पारी और बेबाक अंदाज से बनी रही।

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