'साहित्य और पत्रकारिता भाई-बहन की तरह, दोनों में राष्ट्रबोध जरूरी', धर्मशाला के संगोष्ठी में बोले केसी शर्मा
धर्मशाला में दैनिक जागरण द्वारा आयोजित संगोष्ठी में साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रबोध को समाज व राष्ट्र निर्माण के लिए महत्वपूर्ण ...और पढ़ें

बीएड कॉलेज धर्मशाला में दैनिक जागरण के साहित्य, पत्रिकता और राष्ट्रबोध पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त केसी शर्मा।
HighLights
साहित्य और पत्रकारिता राष्ट्रबोध के बिना प्रभावी नहीं हो सकते।
भारत को 2027 तक तकनीकी व सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होना है।
युवाओं को ज्ञान, परंपरा और राष्ट्रबोध से जोड़ना आवश्यक है।
जागरण संवाददाता, धर्मशाला। राष्ट्रबोध ही साहित्य और पत्रकारिता समाज को प्रभावी बना सकता है। साहित्य और पत्रकारिता भाई-बहन हैं। यूं कहें कि साहित्य अग्रज है और पत्रकारिता उसकी अनुजा है।
दोनों की पृष्ठभूमि एक ही आंगन से जुड़ी है, इसलिए राष्ट्रबोध दोनों के मूल में है। ये शब्द पूर्व राज्य चुनाव आयुक्त केसी शर्मा ने कहे। वह मंगलवार को राजकीय बीएड कॉलेज में दैनिक जागरण की ओर से आयोजित "साहित्य, पत्रकारिता एवं राष्ट्रबोध" विषय पर संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे।
केसी शर्मा ने सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष और साहस का वर्णन करने को राष्ट्रबोध का उदाहरण बताया। केसी शर्मा ने जलियांवाला बाग की घटना से एक दिन पहले लाहौर से शुरू हुए उर्दू समाचार पत्र के संपादक की गिरफ्तारी सहित विभिन्न समाचार पत्रों के संपादकों और उनके राष्ट्रबोध से जुड़े प्रसंगों का भी उल्लेख किया।

मुख्यातिथि के रूप में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कहा कि भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है और विकास की आकांक्षा केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है। तकनीकी क्षमता के साथ सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होना भी जरूरी है। वक्ताओं ने युवाओं को ज्ञान, परंपरा और राष्ट्रबोध से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रो. सत प्रकाश बंसल ने कहा कि भारत परिवर्तन के दौर में है और देश की आकांक्षा केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2027 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में देश को तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से भी आगे बढ़ना होगा। हमें केवल सूचना की नहीं, बल्कि ज्ञान की आवश्यकता है।

इसके साथ ही देश पर गौरव महसूस करने के साथ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। अब हमारा ध्येय केवल सोने की चिड़िया बनने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि देश को सोने का शेर बनाने का होना चाहिए।
इसके लिए युवाओं का सशक्तीकरण जरूरी है। उन्होंने भविष्य के निर्माता प्रशिक्षु शिक्षकों का मार्गदर्शन किया और स्वामी विवेकानंद से जुड़े कई पहलुओं से भी उन्हें अवगत करवाया।
वहीं, विशिष्ट अतिथि एवं बीएड कॉलेज के प्राचार्य आरएस गिल ने पत्रकारिता के महत्व पर प्रकाश डाला। इससे पहले दैनिक जागरण के राज्य संपादक नवनीत शर्मा ने संगोष्ठी के आयोजन के महत्व और इसके उद्देश्य से उपस्थित लोगों को अवगत करवाया।
उन्होंने कहा कि साहित्य, पत्रकारिता और राष्ट्रबोध जैसे विषयों पर संवाद आज के समय में नई पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा श्रेष्ठ हिंदी साहित्य को सम्मानित करने के लिए ही दैनिक जागरण, पूर्व प्रधान संपादक नरेन्द्र मोहन जी की स्मृति में गत वर्ष से 11 लाख रुपये का सम्मान दे रहा है।

पिछले वर्ष यह सम्मान महेंद्र मधुकर को उनकी कृति वक्रतुंड के लिए दिया गया था। इस वर्ष का सम्मान 18 अक्टूबर को दिल्ली में दिया जाएगा। इस अवसर पर महाप्रबंधक रणदीप सिंह एवं समाचार संपादक नीरज आजाद भी मौजूद रहे।
हर संरचना पहले खबर होती है, साहित्य और पत्रकारिता राष्ट्रबोध से जुड़े : चंद्ररेखा
पूर्व प्राध्यापक, साहित्यकार एवं शिक्षाविद् चंद्ररेखा डढवाल ने कहा कि समझ लेना और जान लेना दोनों अलग-अलग बातें हैं और इसी के अनुसार हमारा आचरण भी निर्धारित होता है।
हर संरचना पहले खबर होती है, लेकिन साहित्य और पत्रकारिता दोनों राष्ट्रबोध से जुड़े हैं। साहित्य में ही पत्रकारिता भी मौजूद है। पत्रकार के पास देश के हालात बनाने व बिगाड़ने का विकल्प है। पहला विकल्प देश बनाने का है।
साहित्य व पत्रकारिता सामाजिक परिवर्तन की ताकत: प्रभात
पूर्व सचिव स्कूल शिक्षा बोर्ड प्रभात शर्मा ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता समाज निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं। दोनों सामाजिक परिवर्तन की शक्तियां हैं।
आज पर्यावरण के साथ हो रही अंधाधुंध छेड़छाड़ को लेकर समाज को जागरूक करने की आवश्यकता है। इसमें साहित्य और पत्रकारिता के माध्यम से चेतना जगाई जा सकती है। कोई भी जाति या कुटुंब तब तक उन्नत नहीं हो सकता, जब तक वह साहित्यिक दृष्टि से उन्नत न हो। देश की संस्कृति से ही देश की उन्नति निर्भर करती है।
साहित्य ने जगाई स्वतंत्रता की चेतना, पत्रकारिता ने बढ़ाई जागरूकता: विजय शर्मा
पूर्व प्राचार्य व शिक्षाविद विजय शर्मा ने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता दोनों में राष्ट्रबोध स्वाभाविक है। समाज में घटने वाली कई घटनाएं लोगों को प्रभावित करती हैं, जिन्हें साहित्य में निबंध, उपन्यास और कविताओं के माध्यम से सामने लाया गया है।
पत्रकारिता रोजमर्रा की घटनाओं पर वक्तव्य देती है और उन्हें समाज तक पहुंचाती है। साहित्य में कहानी और उपन्यास के माध्यम से स्वतंत्रता को लेकर चेतना जगाई गई, जबकि पत्रकारिता ने राजनीतिक और सामाजिक जागरूकता पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नैतिकता पढ़ाने से नहीं, आचरण से आती है: आरपी चोपड़ा
पूर्व प्राचार्य आरपी चोपड़ा ने कहा कि साहित्य, पत्रकारिता पूरी ही तब होती है जब उनमें राष्ट्रबोध हो। वर्तमान समय में पत्रकारों का सोच राष्ट्रहित में होना चाहिए और दैनिक जागरण इस दिशा में पहले से काम कर रहा है।
उन्होंने दैनिक जागरण के भारत रक्षा पर्व और संस्कारशाला का उदाहरण भी दिया, जिसमें राष्ट्रबोध की भावना दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि नैतिकता पढ़ाने से नहीं, बल्कि आचरण से आती है।
हमें हर बात के लिए सिस्टम को दोष देने के बजाय अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। जेन जी की आलोचना से पहले यह देखा जाए कि हमने उन्हें क्या सिखाया।
संवेदनशीलता कम हुई, इसलिए साहित्य व पत्रकारिता का प्रभाव भी घटा: डॉ. मलकीयत
केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी प्राध्यापक एवं साहित्यकार डॉ. मलकीत सिंह ने कहा कि साहित्यकार और पत्रकार दोनों समाज की बातें उठाते हैं। पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो राजनीतिक और सामाजिक ही नहीं, बल्कि अन्य तरह की घटनाओं को भी सामने लाता है। साहित्यकार, साहित्यिक रचनाओं से समाज की आवाज उठाते हैं।
मौजूदा समय में साहित्य और पत्रकारिता का प्रभाव इसलिए कम हुआ क्योंकि समाज में संवेदनशीलता कम होती जा रही है। आज हम युद्ध के मुहाने पर खड़े हैं और इसके साथ अफवाह व जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) जैसी चुनौतियां भी सामने हैं। देश को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को ज्ञान और परंपरा से जोड़ना होगा।
