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भाखड़ा बांध के लिए उजड़ गए बिलासपुर के 52 हजार लोग, पंडित नेहरू का वादा 65 साल बाद भी अधूरा

By Shubham Rahi Edited By: Rajesh Sharma
Published: Sun, 09 Aug 2026 06:28 AM (IST)Updated: Sun, 09 Aug 2026 11:01 AM (IST)

पुराने बिलासपुर शहर को भाखड़ा बांध के कारण जलमग्न हुए 65 साल हो गए हैं, जिससे 52,000 लोग विस्थापित हुए ...और पढ़ें

भाखड़ा बांध में डूबा बिलासपुर शहर। जागरण

भाखड़ा बांध में डूबा बिलासपुर शहर। जागरण

HighLights

  1. पुराना बिलासपुर शहर 9 अगस्त 1961 को जलमग्न हुआ।

  2. भाखड़ा बांध के कारण 52,000 लोग विस्थापित हुए।

  3. विस्थापितों को आज भी पुनर्वास और प्लाटों का इंतजार।

संवाद सहयोगी, बिलासपुर। आज पुराने बिलासपुर शहर को जलमग्न हुए पूरे 65 साल हो गए हैं। 9 अगस्त 1961 का वह दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया, जब देश को रोशन करने के लिए बनाए गए भाखड़ा बांध की कीमत पर बिलासपुर का ऐतिहासिक शहर और 354 गांव झील में समा गए। करीब 12,000 परिवारों और 52,000 लोगों को अपने घर-बार छोड़ने पड़े। आज नया बिलासपुर शहर भले ही बस गया हो, लेकिन विस्थापितों का दर्द और संघर्ष आज भी खत्म नहीं हुआ है।

पुराने शहर को याद करते हुए वरिष्ठ नागरिक आज भी भावुक हो जाते हैं। वह बताते हैं कि कहलूर रियासत के राजा दलीपचंद द्वारा बसाया गया यह शहर सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि यहां की गलियों, चौबारों, मंदिरों और मीठे जल के स्रोतों में एक संपूर्ण संस्कृति बसती थी। धौलरा का महल, चामडू के कुएं, पंचरुखी का मीठा पानी, और गोपाल मंदिर के दुर्लभ चित्र, सब कुछ झील की गहराइयों में खो गया।

नेहरू का वादा आश्वासन बनकर ही रह गया

आपको बता दें कि देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने जब भाखड़ा बांध को देश का आधुनिक मंदिर कहा था, तब उन्होंने यह भी वादा किया था कि विस्थापितों को इतनी सुविधाएं दी जाएंगी कि वह अपना दर्द भूल जाएंगे। लेकिन यह वादा सिर्फ़ एक आश्वासन बनकर रह गया। विस्थापितों का सही ढंग से पुनर्वास नहीं हो पाया, और जिन जमीनों पर उन्होंने शरण ली, उनका मालिकाना हक भी उन्हें नहीं मिला।

डेढ़ सौ वर्ग मीटर की पालिसी, जो अवैध कब्जों को नियमित करने के लिए लाई गई, वास्तव में गैरविस्थापितों के लिए अधिक लाभकारी साबित हुई।

क्या कहते हैं विस्थापित समिति के पदाधिकारी

वहीं, सर्वदलीय भाखड़ा विस्थापित एवं प्रभावित समिति के महासचिव पंडित जयकुमार शर्मा और ग्रामीण भाखड़ा विस्थापित सुधार समिति के अध्यक्ष देशराज शर्मा का कहना है कि विस्थापितों को हर बार राजनीतिक उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। अगर पुराना शहर आज होता, तो यहां की समृद्ध संस्कृति और विरासत कुछ और ही स्वरूप में सामने होती। 

दिवंगत विधायक पंडित दीनानाथ ने भी अपनी प्रसिद्ध कविता नौ अगस्त की शाम में उस दर्दनाक पल का मार्मिक चित्रण किया है। वर्तमान में, विस्थापितों की सबसे बड़ी समस्या प्लाट और पुनर्वास है। 

राज्य सरकार का नया प्रस्ताव

राज्य सरकार ने अब एक नया प्रस्ताव तैयार किया है, जिसके तहत निजी जमीन खरीदकर विस्थापितों को प्लाट देने की योजना बनाई गई है। पहले एम्स के समीप चंगर पलासीं की 256 बीघा जमीन का चयन किया गया था लेकिन वह उपयुक्त नहीं पाई गई। इसके बाद ग्वालथाई के पास सरकारी भूमि पर विचार किया गया, लेकिन वहां भी बात नहीं बनी। 

अब प्रशासन ने राज्य सरकार को निजी भूमि खरीदने का प्रस्ताव भेजा है। स्वीकृति मिलते ही यह योजना अमल में लाई जाएगी और दशकों से प्लाटों का इंतजार कर रहे विस्थापितों को उनका हक मिलने की संभावना बन गई है। 

दो सेक्टर तैयार करने की हुई थी घोषणा

वहीं, पूर्व सरकारों ने भी समय-समय पर इस मुद्दे पर योजनाएं बनाईं। वीरभद्र सिंह सरकार के कार्यकाल में एचआरटीसी कालोनी के पास दो सेक्टर तैयार करने की घोषणा हुई थी और प्लाट भी तैयार किए गए थे, लेकिन विस्थापितों की रुचि नहीं होने के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।

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