श्रीप्रकाशम अय्यर सरकारी नौकरी से रिटायर्ड होकर आराम से जिंदगी बसर कर रहे थे। बस उम्र के साथ उनकी याददाश्त थोड़ी कम हो चुकी थी, लेकिन वह अपनी दिनचर्या के काम परिवार के किसी सदस्य की मदद के बगैर जैसे-तैसे पूरा कर लेते। दिन बीतते गये और एक दिन जब वह सुबह की सैर से लौटे, तब उनकी पत्नी ने कहा कि स्टोर रूम की चाबी दीजिए, कुछ सामान निकालना है। इस पर उन्होंने कहा कि तुमने चाबी मुझे दी ही कब थी। पत्नी द्वारा बाद में तलाशने पर पता चला कि उनकी चाबी

उनके ही टेबल पर थीं। परिवार के सदस्यों की धारणा थी कि यह सब कुछ वृद्धावस्था में होता है, लेकिन हद तो तब पार हो गयी, जब करीबी लोगों के नाम भी वह भूलने लगे। बात करने में वह सही शब्दों का उच्चारण करने में दिक्कत महसूस करते। उनके घर वाले तो तब हैरान हो गए, जब पाजामा का नाड़ा बांधने और कपड़े पहनने में भी उन्हें दिक्कत होने लगी। इस स्थिति को देख परेशान होकर अंत में उनके घर वाले डॉक्टर के पास ले गए। डॉक्टर ने लक्षणों के आधार पर रोगी के परिजनों को बताया कि वह अल्जाइमर रोग से ग्रस्त हैं, जिसके इलाज के लिए उन्हें न्यूरोलॉजिस्ट और मनोचिकित्सक की राय लेनी होगी। बाद में वह मेरे पास आए। चंद महीनों तक इलाज जारी रहने के बाद उनकी स्थिति बेहतर हुई। इस प्रकार इलाज के परिणाम उत्साहव‌र्द्धक रहे।''

यह कहना है फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. संजय कुमार सक्सेना का। उनके अनुसार सामान्यत: बुजुर्गावस्था में होने वाला यह एक ऐसा रोग है, जिसमें रोगी की स्मरणशक्ति गंभीर रूप से कमजोर हो जाती है। याददाश्त क्षीण होने के अलावा रोगी की सूझबूझ, भाषा, व्यवहार और उसके व्यक्तित्व पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

कारण

कानपुर के न्यूरो सर्जन डॉ. विकास शुक्ला के अनुसार उम्र बढ़ने के साथ तमाम लोगों में मस्तिष्क की कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) सिकुड़नें लगती हैं। इस स्थिति में न्यूरॉन्स के अंदर कुछ केमिकल्स कम हो जाते हैं और कुछ केमिकल्स ज्यादा हो जाते हैं। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में अल्जाइमर रोग कहते हैं। अन्य कारणों में 30 से 40 फीसदी मामले आनुवांशिक होते हैं। इसके अलावा हेड इंजरी, वाइरल इंफेक्शन और ब्रेन स्ट्रोक भी इस रोग के कारण हो सकते हैं। वहीं दिमाग में पानी सरीखा द्रव भर जाना भी इस रोग का कारण बन सकता है।

वहीं डॉ. पी.पी अशोक की राय है कि ब्रेन सेल्स जिस केमिकल का निर्माण करती हैं, उसे एसीटिलकोलीन कहते हैं। जैसे-जैसे ब्रेन सेल्स सिकुड़ती जाती हैं, वैसे-वैसे एसीटिलकोलीन के निर्माण की प्रक्रिया कम होती जाती है। दवाओं के जरिये एसीटिलकोलीन के कम होने की प्रक्रिया को बढ़ाया जाता है। उनके अनुसार बढ़ती उम्र के साथ ब्रेन केमिकल्स का कम होते जाना एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन अल्जाइमर डिजीज में यह न्यूरो केमिकल कहींज्यादा तेजी से कम होता है। इस रोग को हम क्योर(यहां आशय रोग को दूर करने से है)नहीं कर सकते, लेकिन मेडिसिन देने से रोगी को कुछ न कुछ राहत जरूर मिलती है।

जांच

पॉजीट्रॉन इमीशन टोमोग्राफी (पी.ई.टी.) जांच से इस रोग का पता चलता है। इसके अलावा रोगी के परिजनों को कुछ अन्य सुझावों पर अमल करना चाहिए ..

रोगी का कमरा

-रोगी का कमरा खुला व हवादार हो। दिन में नियमित रूप से खिड़की से पर्दे हटा दें। ऐसे में रोगी को दिन-रात का अंदाजा बना रहता है।

-दीवार पर बड़े अंकों वाला कैलेंडर व घड़ी टांगें।

-कमरे में परिजनों के फोटो फ्रेम करके लगाएं।

-रोगी के जीवन से जुड़ी स्मरणीय घटनाओं से संबंधित चित्रों कोकमरे में सजाएं।

सुरक्षा

कानपुर के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. उन्नति कुमार कहते हैं कि अल्जाइमर से पीड़ित रोगियों की सुरक्षा का पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे

-रोगी अक्सर घर से बाहर निकल जाते हैं और भटक जाते हैं। ऐसे में रोगी की जेब में पहचान पत्र रखें या उन्हें फोन नम्बर लिखा हुआ लॉकेट पहनाएं।

-रोगी अक्सर गिर पड़ते हैं और चोटिल हो जाते हैं। इसलिए रोगी को मजबूत छड़ी या वॉकर दें।

दिनचर्या

-रोगी की दिनचर्या को सहज व नियमित रखने का प्रयास करें।

रोगी से संवाद

रोगी की देखभाल के दौरान उसके साथ पूर्ण संवाद बनाए रखें। रोगी बताए कि अभी समय क्या है, घर में कौन आया है और आप उसके लिए क्या करने जा रहे हैं।

रोकथाम

लोगों को शुरू से ही संतुलित व पोषक आहार ग्रहण करना चाहिए। मानसिक संतुलन कायम रखने के लिए ध्यान (मेडिटेशन) और ईश्वर व अध्यात्म पर विश्वास रखें। इसके अलावा किसी भी प्रकार के मादक पदार्र्थो की लत से दूर रहें।

(विवेक शुक्ला)

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