जिन आनुवंशिक स्वास्थ्य समस्याओं को गंभीर रोगों की श्रेणी में रखा जाता है, थेलासीमिया भी उनमें से एक है। इसमें जीन की संरचना में जन्मजात रूप से गड़बड़ी होने की वजह से शरीर में शुद्ध रक्त का निर्माण नहीं हो पाता और डिफेक्टिव ब्लड शरीर के अपने मेकैनिज्म के जरिये स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाता है। इस वजह से थेलासीमिया के मरीजों के शरीर में हमेशा खून की कमी रहती है और उसमें हीमोग्लोबिन का स्तर भी बहुत कम रहता है। अकसर लोग इसे बच्चों की बीमारी समझ लेते हैं, पर वास्तव में ऐसा है नहीं। दरअसल जिनकी रक्त कोशिकाओं की संरचना में बहुत ज्यादा गड़बड़ी होती है, उनमें जन्म के कुछ दिनों के बाद ही इस बीमारी की पहचान हो जाती है, अगर रक्त कोशिकाओं की संरचना में ज्यादा गड़बड़ी न हो तो कई बार लोगों में 60-65 वर्ष की उम्र में भी अचानक इस बीमारी के लक्षण देखने को मिलते हैं।

घबराएं नहीं थेलासीमिया कैरियर

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनमें 3 से 15 प्रतिशत तक इस बीमारी के जींस मौजूद होते है, इन्हें थेलासीमिया कैरियर कहा जाता है। कुछ लोग इसे थेलासीमिया माइनर का नाम देते हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है। ऐसे लोग सक्रिय और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं। देश के सुपर स्टार अमिताभ बच्चन इस बात की जीती-जागती मिसाल हैं। थेलासीमिया के कैरियर लोगों को केवल इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे किसी थेलासीमिया कैरियर से विवाह न करें। अगर पति-पत्नी दोनों ही इसके कैरियर हों तो बच्चों में इसके लक्षण होने की आशंका बढ़ जाती है। अगर पति-पत्नी दोनों इस बीमारी के वाहक हैं तो गर्भावस्था के शुरुआती दो महीनों में स्त्री को प्रीमेटल डाइग्नोसिस करवा लेना चाहिए। इससे यह मालूम हो जाएगा कि गर्भस्थ भ्रूण में थेलासीमिया के लक्षण हैं या नहीं। अगर रिपोर्ट निगेटिव आए तभी शिशु को जन्म देने का निर्णय लेना चाहिए।

क्या है लक्षण

1. त्वचा की रंगत में स्वाभाविक गुलाबीपन के बजाय पीलापन दिखाई देता है। ऐसे लोगों में अकसर जॉन्डिस का इन्फेक्शन भी हो जाता है।

2. लिवर बढ़ने से पेट फूला हुआ लगता है और हीमोग्लोबिन का स्तर भी काफी कम होता है।

3. अनावश्यक थकान और कमजोरी महसूस होती है।

स्टेम सेल से उपचार

अब तक इसे लाइलाज बीमारी समझा जाता था, क्योंकि नियमित ब्लड ट्रांस्फ्यूजन के अलावा इसका और कोई उपचार नहीं था। यह बल्ड ट्रांस्फ्यूजन मरीज को मौत से बचाए रखने में मददगार साबित होता है, लेकिन यह इस बीमारी का स्थायी उपचार नहीं है। इसे जड़ से समाप्त करने का एकमात्र तरीका स्टेम सेल थेरेपी है। इसके जरिये जन्म के शुरुआती 10 मिनट के भीतर शिशु के गर्भनाल से एक बैग में रक्त के नमूने एकत्र किए जाते है। इसी रक्त में स्टेम सेल्स पाए जाते है। जीवन की ये मूलभूत कोशिकाएं, मानव शरीर के सभी अंगों की रचना का आधार होती है। इनकी तुलना मिट्टी से की जा सकती है, जिसे शिल्पकार मनचाहे आकार में ढाल सकता है। इन्हें शरीर में जहां भी प्रत्यारोपित किया जाता है, ये वहीं दूसरी नई परिपक्व कोशिकाओं का निर्माण करने में सक्षम होती है।

प्रक्रिया स्टेम सेल के संग्रह की

जन्म के बाद दस मिनट के भीतर शिशु के गर्भनाल से थोड़ा सा खून लेकर उसे एक स्टरलाइज्ड बैग में रखा जाता है। सैंपल एकत्र करके उसके तापमान को नियंत्रित रखने के लिए उसे एक खास तरह के कंटेनर में रख कर 36 घंटे के भीतर लैब में पहुंचा दिया जाता है। स्टेम सेल को वहां वर्षो तक संरक्षित रखा जा सकता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित है। इससे मां और बच्चे दोनों को कोई तकलीफ नहीं होती और इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता।

कैसे होता है उपचार

जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि थेलासीमिया जीन की संरचना में गड़बड़ी की वजह से होने वाली रक्त संबंधी आनुवंशिक बीमारी है। इसके लिए मरीज के बोन मैरो में मौजूद खराब जीन वाली कोशिकाओं को हटाकर उसकी जगह पर स्टेम सेल के जरिये सही जीन वाली रक्त कोशिकाएं प्रत्यारोपित कर दी जाती हैं, जिन्हें मदर सेल भी कहा जाता है। फिर धीरे-धीरे ये कोशिकाएं अच्छी कोशिकाओं का निर्माण शुरू कर देती हैं। इस तरह यह बीमारी जड़ से दूर हो जाती है। स्टेम सेल पद्धति द्वारा थेलासीमिया के अलावा स्पाइनल इंजरी की वजह से होने वाली विकलांगता, पार्किसन, दिल की बीमारी, ब्लड कैंसर और डायबीटिज जैस रोगों का उपचार संभव है। इस दिशा में वैज्ञोनिकों का शोध जारी है और संभव है कि निकट भविष्य में इससे अन्य गंभीर बीमारियों का उपचार भी आसानी से संभव हो।

कुछ जरूरी बातें

जन्म के बाद जिस बच्चे का स्टेम सेल सुरक्षित रखा जाता है। उससे भविष्य में उसे होने वाली लगभग सभी बीमारियों का उपचार संभव है। केवल इससे बच्चे के जन्मजात रोगों का उपचार संभव नहीं है, क्योंकि उसके स्टेम सेल में भी उस बीमारी के जींस मौजूद होंगे। इसके लिए शिशु को उसके सगे भाई या बहन के स्टेम सेल की जरूरत होगी, जिसे जन्मजात रूप से वह बीमारी न हो, लेकिन इसके लिए भी भाई या बहन के साथ बच्चे की कोशिकाओं का मैच होना बहुत जरूरी है। इसकी संभावना 25 से 75 प्रतिशत तक बताई जाती है। इसके अलावा अगर कोशिकाओं का सही मैच मिल जाए तो इससे माता-पिता,दादा-दादी और नाना-नानी का भी उपचार संभव है। अगर किसी मरीज के लिए उसका या उसके भाई-बहनों का स्टेम सेल संरक्षित करके नहीं रखा गया है तो बोन मैरो ट्रांस्प्लांट के जरिये भी उसका उपचार संभव है। ट्रांस्प्लांट के लिए भाई या बहन का बोन मैरो सबसे उपयुक्त होता है क्योंकि उनकी कोशिकाओं का मैच मिलने की संभावना सबसे अधिक होती है।

बेटे को मिली नई जिंदगी

मनीषा पाल, शिक्षिका सिलीगुड़ी

पांच वर्षो के लंबे इंतजार के बाद 25 फरवरी 2005 को जब हमारे बेटे मोइनाम का जन्म हुआ तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जन्म के समय वह देखने में बिलकुल सामान्य स्वस्थ बच्चों की तरह था। प्रेग्नेंसी के दौरान मुझे या मेरी डॉक्टर को ऐसा कुछ भी असामान्य अनुभव नहीं हुआ, जिससे यह अंदाजा लगाया जा सके कि भविष्य में मेरे बच्चे को कोई गंभीर बीमारी होगी, लेकिन मोइनाम के पहले जन्मदिन के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ कि दूसरे बच्चों की तुलना में वह काफी सुस्त और कमजोर है। उसके चेहरे पर बच्चों जैसी स्वाभाविक चमक नहीं थी। तब मैंने सिलीगुड़ी के एक चाइल्ड स्पेशलिस्ट से संपर्क किया। उन्होंने मोइनाम का ब्लड टेस्ट करवाया, जिसमें उसके हीमोग्लोबिन का स्तर अस्वाभाविक रूप से कम पाया गया, जबकि इस उम्र में सामान्यत: बच्चों के हीमोग्लोबिन का स्तर 11.5 होता है। डॉक्टर ने समझा कि उसे एनीमिया है और उसे एक महीने के लिए आयरन टॉनिक दिया। एक महीने बाद जब मैंने दोबारा उसका ब्लड टेस्ट कराया तो उसके हीमोग्लोबीन का स्तर पहले से भी कम हो गया। इसके बाद जब हमने उसका इलेक्ट्रोफोरेसिस टेस्ट करवाया तो उसकी रिपोर्ट से मालूम हुआ कि मोइनाम एचबीई-बीटा थेलासीमिया नामक बीमारी से ग्रस्त है। डॉक्टर ने हमें बताया कि इस बीमारी से ग्रस्त बच्चों को नियमित रूप से ब्लड ट्रांस्फ्यूजन करवाना होता है और ऐसे बच्चों की उम्र 10 साल से ज्यादा नहीं होती। हमारे लिए इस कड़वी सच्चाई को स्वीकारना बहुत मुश्किल था कि हमारा बच्चा ऐसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त है। हमने दूसरे डॉक्टर से भी राय ली। उन्होंने भी वही बात दुहराई। उसके शरीर में हीमोग्लोबिन का सामान्य स्तर बनाए रखने के लिए हमें नियमित रूप से उसका ब्लड ट्रांस्फ्यूजन करवाना पड़ता था। उसकी यह हालत देखकर हमें बहुत दुख होता था। हम दिन-रात इसी सोच में डूबे रहते कि हमारे बेटे की बीमारी कैसे दूर होगी? फिर हमने दिल्ली के एम्स और अपोलो हॉस्पिटल के डॉक्टरों से भी बात की तो उन्होंने स्टेम सेल थेरेपी के जरिये उसका उपचार कराने की सलाह दी। इसके बाद सिलीगुड़ी लौटकर हमने ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट की तलाश शुरू कर दी। काफी कोशिशों के बाद हमारी मुलाकात कोलकाता स्थितनेता जी सुभाषचंद्र बोस कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर डॉ.आशीष मुखर्जी से हुई। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि मोइनाम की यह बीमारी दूर हो सकती है, बशर्ते उसके दूसरे भाई या बहन को यह बीमारी न हो और उसका स्टेम सेल मोइनाम से मैच कर जाए। हालांकि मैं और मेरे पति अशिम हम दोनों ही थेलासीमिया के कैरियर हैं। इसलिए बहुत आशंका थी कि कहीं हमारे दूसरे बच्चे को भी थेलासीमिया न हो। फिर भी हमने दूसरे बच्चे को जन्म देने का निर्णय लिया। इसके बाद डॉ. मुखर्जी ने कॉर्डलाइफ इंडिया के डायरेक्टर डॉ. प्रशांतो चौधरी से हमारा परिचय करवाया। उन्होंने हमें स्टेम सेल सुरक्षित रखने की पूरी प्रक्रिया के बारे में समझाया। इसके बाद ईश्वर की कृपा से मेरी बेटी पूर्णत: स्वस्थ पैदा हुई और जन्म के समय हमने उसका स्टेम सेल सुरक्षित करवा लिया। जांच से मालूम हुआ कि उसे थेलासीमिया नहीं है और उसका स्टेम सेल उसके भाई से पूरी तरह मैच कर रहा है। मोइनाम को साइड इफेक्ट से बचाने और उसे शीघ्र स्वस्थ करने के लिए डॉक्टर ने स्टेम सेल थेरेपी के साथ बोन मैरो ट्रांस्प्लांट का भी सहारा लिया। जिस दिन बोनमैरो ट्रांस्प्लांट होने वाला था, उस दिन मुझे ऐसी विचित्र सी अनुभूति हो रही थी कि उसे शब्दों में व्यक्त कर पाना मुश्किल है। जहां एक ओर मेरी दो वर्षीया बच्ची अपना बोनमैरो डोनेट करने के लिए अस्पताल में भर्ती थी, वहीं दूसरी ओर ट्रांस्प्लांट के लिए मेरा बेटा बेड पर लेटा हुआ था। उस समय हमें बहुत घबराहट महसूस हो रही थी। मन में इस बात का संशय बना हुआ था कि यह उपचार सफल होगा या नहीं? खैर, डॉक्टरों की मेहनत रंग लाई और हमने राहत की सांस ली। अब हम कह सकते हैं कि मोइनाम के स्वास्थ्य में तेजी से सुधार हो रहा है। उसने स्कूल जाना भी शुरू कर दिया है और दूसरे बच्चों की तरह सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा है।

प्रस्तुति : विनीता

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