सामान्य रूप से वयस्क शख्स का हृदय एक मिनट में 60 से 100 बार धड़कता है, लेकिन अगर हृदय की धड़कनें एक मिनट में 60 बार से कम धड़कें तो समझिए कि आपको डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है। इस समस्या को ब्रेडीकार्डिया कहते हैं, जिसका अब कारगर इलाज संभव है...

ब्रेडीकार्डिया काफी गंभीर समस्या है क्योंकि इसका मतलब है कि आपका हृदय इतना ज्यादा पंप नहीं कर पा रहा है कि ऑक्सीजनयुक्त रक्त शरीर में प्रचुर मात्रा में पहुंच सके। इस स्थिति से रोगी को सामान्य गतिविधियां करने में दिक्कत महसूस होती है।

कारण

गौरतलब है कि हृदय की गति के कम होने का अर्थ है- दिल के इलेक्ट्रिकल सिस्टम में समस्या होना। इसकी कई वजहें हो सकती हैं जिसमें उम्र के साथ हृदय के टिश्यू का क्षतिग्रस्त होना, उच्च रक्तचाप, जन्म के समय हृदय में कोई समस्या होना, किसी जटिल सर्जरी का होना और

इलेक्ट्रिकल सिस्टम में किसी आवश्यक खनिज लवण (मिनरल्स) का कम होना आदि।

इस समस्या के चलते दिल का दौरा पडऩे या हृदय की कोई बीमारी हो सकती है। ब्रेडीकार्डिया की समस्या में सोने में भी तकलीफ होती है। अगर आप उच्च रक्तचाप या दिल से जुड़ी किसी बीमारी के चलते दवाई ले रहे हैं, तो भी ये

समस्या हो सकती है। अगर इलेक्ट्रिकल सिस्टम में ज्यादा समस्या हो,तो लगातार बेहोशी महसूस होती है या दिल ऑक्सीजनयुक्त रक्त देने में नाकाम रहता है।

लक्षण

- बेहोश होना।

- कमजोरी और थकान महसूस होना।

- सांस लेने में तकलीफ होना।

- सीने में दर्द होना।

- किसी बात को याद रखने में दिक्कत होना।

- किसी भी शारीरिक गतिविधि को करते समय बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।

लेकिन ये जानना बहुत जरूरी है कि कई बार अपवाद स्वरूप युवाओं और एथलीटों की धड़कनें सामान्य से कम होती हंै, इसके बावजूद वे सामान्य होते हैं और उन्हें ब्रेडीकार्डिया की बीमारी नहीं होती है। अगर किसी शख्स मेंउपर्युक्त लक्षण लगातार प्रकट हो रहे हैं, तो शीघ्र ही डॉक्टर से परामर्श करें।

इलाज

ब्रेडीकार्डिया का इलाज रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाता है। अगर ये बीमारी ज्यादा गंभीर स्थिति में नहीं है तो डॉक्टर दवाइयों में बदलाव कर देते हैं। लेकिन अगर इलेक्ट्रिकल सिस्टम में खराबी हो गई है,तो पेसमेकर लगाना

ही इसका एकमात्र इलाज है। एक आधुनिक मिनिएचर ट्रांस केथेटर पेसिंग सिस्टम यानी टीपीएस अन्य पारम्परिक पेसमेकर के मुकाबले काफी छोटा है और इसे लगाने के लिए बहुत कम चीरा लगाने की जरूरत पड़ती है। टीपीएस को सीधे ही कैथेटर की मदद से हृदय के साथ जोड़ दिया जाता है। इस प्रक्रिया में सर्जरी करने की जरूरत नहीं होती और न ही त्वचा के भीतर जेबनुमा भाग बनाने कीआवश्यकता होती है। टीपीएस को लगाने के बाद अगर जरूरत महसूस होती है, तो इसकी स्थिति में भी बदलाव किया जा सकता है।

टीपीएस जैसी आधुनिक तकनीक के साथ ब्रेडीकार्डिया के रोगी अब आसानी से सामान्य जिंदगी बिता सकते हंै।

डॉ. अतुल माथुर निदेशक इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग फोर्टिस एस्काट्र्स हार्ट इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली

Posted By: Babita kashyap

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