धूल, धुएं से मिश्रित हवा अगर किसी पर सबसे ज्यादा कहर बरपा रही है, तो वे बच्चे ही हैं। प्रदूषित हवा नन्हे बच्चों के फेफड़ों को इस कदर नुकसान पहुंचा रही है कि इन दिनों बिल्कुल छोटी उम्र में ही बच्चों में सांस के रोग होना एक सामान्य स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। अगर आप शहर में रहते हैं तो यह खतरा और ज्यादा है।

शहरों में बढ़ते औद्योगीकरण और हरियाली के अभाव में बच्चों को शुरुआत से ही स्वच्छ हवा नहीं मिल पा रही है। सड़क ही नहीं, घर के अंदर की हवा में भी इन दिनों विषैले रसायन बढ़ते जा रहे हैं। साथ ही, विशेषज्ञ बताते हैं कि जन्म के समय बच्चों के फेफड़े और उनकी रोग प्रतिरोधी क्षमता का पूरी तरह विकास नहींहुआ होता है। सामान्य तौर पर इनके पूरी तरह विकसित होने में छह साल तक का समय लग जाता है। तिस पर वयस्कों की तुलना में बच्चे ज्यादा तेजी से सांस लेते हैं। बच्चों का जमकर खेलना-कूदना तो अच्छी बात है, लेकिन इस दौरान उनकी सांस लेने की रफ्तार बढ़ जाती है। तब उनके शरीर में प्रदूषित तत्वों के प्रवेश करने की आशंका भी ज्यादा होती है। हालत यह है कि महानगरों में लगभग एक चौथाई बच्चों में हल्के से लेकर गंभीर किस्म के अस्थमा या दमा के मामले सामने आ रहे हैं।

दिल्ली के वसंत कुंज स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. विवेक नांगिया कहते हैं कि मासूम बच्चों के कोमल फेफड़ों को हवा में व्याप्त प्रदूषण की मार से सुरक्षित रखना एक बड़ी चुनौती बन गया है। बच्चों को लेकर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि उस समय उनका रोग प्रतिरोधी तंत्र और श्वश्न तंत्र इससे जूझने लायक नहीं हुआ होता है। उस पर से बच्चे उस माहौल में ज्यादा रहते हैं, जहां उनके चपेट में आने का डर ज्यादा होता है। कॉलोनी या स्कूल का मैदान हो या स्कूल बस, इन जगहों पर बच्चों पर धूल व प्रदूषण का हमला लगातार बढ़ता जा रहा है। क्रेच या स्कूल जाने वाले बच्चों को संक्रमण की आशंका भी ज्यादा होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर बच्चे हाथ धोने जैसी सावधानियां नहीं रख पाते। इसलिए ऐसे मामलों में बच्चों को तेज बुखार, लंबे समय तक कफ, नाक बंद रहना, सांस लेते समय आवाज सुनायी देना या सांस लेने में परेशानी होने जैसी समस्याएं हो जाती हैं। कई बार बच्चों को इस वजह से फ्लू और एलर्जी हो जाती है। दूसरीवजहों से हुई ऐसी परेशानियां भी प्रदूषण की वजह से बढ़ जाती हैं। खासकर अगर ये लंबे समय तक रहने लगें, तो इन्हें गंभीरता से लेने की जरूरत होती है।

जानकारों के मुताबिक पिछले दो-तीन दशक के दौरान प्रदूषण से होने वाली परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि धूल और प्रदूषण की वजह से बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी इन समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही है। सांस संबंधी बीमारियों को धूल व प्रदूषण आसानी से ठीक भी नहीं होने देते। लगातार प्रदूषण की चपेट में आने से बच्चों की टी सेल्स कमजोर होती हैं और इस कारण उनके दूसरे रोगों की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है।

सच्चाई यह है कि बच्चों की सेहत पर हो रहे प्रदूषण के हमले से बचाना आपके स्वयं के वश में नहीं है। अपने मोहल्ले और शहर में आप सामूहिक तौर पर इसके लिए प्रयास जरूर कर सकते हैं। साथ ही अगर आपके अपने घर में चूल्हे से निकलने वाले धुएं या किसी और कारण से बच्चों को प्रदूषण का सामना करना पड़ता है, तो बच्चे को उससे बचाने के लिए तुरंत ध्यान देना होगा। साथ ही,अपने छोटे बच्चों को धूल व धुंध आदि से बचाने की कोशिश करें। अगर आपके बच्चे को इन परिस्थितियों में समस्या होती है, तो उनकी दिनचर्या में उसी मुताबिक बदलाव लाएं।

जब सड़कों पर वाहनों की भीड़ ज्यादा होती है, उस दौरान बच्चों को सड़कों पर नहीं निकलना चाहिए। बच्चे को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की आदत डलवाएं। बच्चा अगर मुंह खोल कर सांस ले रहा है, तो उसे तुरंत अपनी आदत बदलने को कहें। तमाम सावधानियों के बावजूद अगर बच्चे को सांस संबंधी समस्या हो जाती है, तो असहज या अनावश्यक रूप से परेशान न हों। अगर बचाव व इलाज पर ठीक से ध्यान दिया जाए, तो समय के साथ जैसे-जैसे उनकी रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है, अधिकांश बच्चों में यह समस्या खत्म भी हो जाती है। 12 वर्ष की उम्र तक अधिकांश मामलों में बच्चे सामान्य हो जाते हैं।

मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस