रावण दहन तो कहीं पूजन... हरियाणा के इस मंदिर में ब्राह्मण रूप में विराजमान हैं लंकापति
यमुनानगर के एक अनोखे मंदिर में दशहरे पर रावण दहन के बजाय ब्राह्मण रूप में उनकी पूजा की जाती है।

हरियाणा के इस मंदिर में ब्राह्मण रूप में विराजमान हैं लंकापति (फाइल फोटो)
HighLights
यमुनानगर में रावण की ब्राह्मण रूप में होती है पूजा
जंगलिया बान प्रस्त ने श्रीलंका से लाई ईंटों से बनवाया मंदिर
हरियाणा का एकमात्र मंदिर जहां रावण की प्रतिमा स्थापित है
राहुल शर्मा, यमुनानगर। दशहरे पर देशभर में रावण के पुतलों का दहन किया गया, पर यमुनानगर के मंदिर में रोज की तरह लंकापति रावण की प्रतिमा के सामने श्रद्धालु शीश नवाते नजर आए।
यहां पश्चिम यमुना नहर के किनारे स्थित मंदिर में रावण ब्राह्मण रूप में विराजमान हैं। इसे हरियाणा का इकलौता ऐसा मंदिर बताया जाता है, जहां रावण की प्रतिमा स्थापित है और उसकी पूजा-अर्चना होती है। मंदिर का इतिहास जंगलिया बान प्रस्त की तपस्या, श्रीलंका से लाई ईंटों व प्राचीन साधना स्थल से जुड़ी मान्यताओं के कारण खास है।
श्रीलंका की दो ईंटों से रखी मंदिरों की नींव
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जंगलिया बान प्रस्त रेलवे में नौकरी करते थे। इस दौरान उन्होंने श्रीलंका की यात्रा की, जहां से दो ईंटें लेकर आए। इन्हीं से करुणा सागर शिव-पार्वती व तपस्वी राम लक्ष्मण जानकी मंदिर की नींव रखी।
करुणा सागर शिव मंदिर में शिव-पार्वती, श्रीराम-लक्ष्मण, मार्कंडेय ऋषि व शिवलिंग और नंदी महाराज स्थापित हैं। साथ में रावण की ब्राह्मण रूप में प्रतिमा भी विराजमान है। प्रतिमा किस धातु से बनी है, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। परिसर में बने दूसरे मंदिर में शनिदेव शिला रूप में पूजे जाते हैं।
श्रीलंका यात्रा बाद नौकरी छोड़ की तपस्या
अभी मंदिर की देखरेख कर रहे नरेश ने बताया कि पूर्वजों ने बताया था कि जंगलिया बान प्रस्त ने श्रीलंका की यात्रा के बाद नौकरी छोड़ यह मंदिर बनवाए। साथ में कुटी बनाई, जिसमें साधना शुरू की।
मान्यता है कि उन्होंने एक पैर पर खड़े होकर 14 साल तक तपस्या की। जिस स्थान पर उन्होंने साधना की, वहां आज उनकी व उनकी पत्नी की समाधियां हैं। दुर्गम रास्ते के कारण मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं है, इसलिए मंदिर से अधिकांश लोग अनभिज्ञ हैं। मंदिर यमुनानगर जगाधरी रेलवे स्टेशन के पास रेलवे पुल पर यमुना नहर किनारे टपरी इलाके में है।
शिलालेखों में 1966 का उल्लेख, पड़ताल जरूरी
मंदिर परिसर में लगे शिलालेखों पर करुणा सागर शिव मंदिर व तपस्वी राम से संबंधित उल्लेख हैं। जंगलिया बान प्रस्त व उनकी पत्नी की आकृतियों वाली पट्टिका भी मौजूद है।
एक शिलालेख पर 24 मार्च 1966 की तारीख अंकित है। मान्यता है कि मंदिर का निर्माण इसी वर्ष हुआ था। शिलालेखों का पूरा पाठ, समाधियों का इतिहास व श्रीलंका से लाई ईंटों से जुड़ी मान्यताओं की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। पुरातत्व विभाग व इतिहास विशेषज्ञों का सर्वेक्षण इस स्थल के इतिहास की कई परतें खोल सकता है।
