जागरण संवाददाता, यमुनानगर : पराली का समाधान है समझदारी.. अभियान के तहत दैनिक जागरण की ओर से कृषि विज्ञान केंद्र दामला में पैनल डिस्कशन का आयोजन हुआ। इसमें केंद्र के वरिष्ठ संयोजक डा. एनके गोयल मुख्य रूप से उपस्थित रहे। इस दौरान अवशेष प्रबंधन को लेकर आने वाली दिक्कतों, उनके समाधान व फायदों पर चर्चा की। डा. गोयल ने किसानों के सवालों का जवाब दिया। साथ ही कहा कि फसल अवशेष प्रबंधन समय की मांग है। यह न केवल पर्यावरण प्रदूषण का समाधान है, बल्कि भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में भी कारगर साबित होता है। उन्होंने किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के तरीकों से भी अवगत कराया। इस दौरान महिला किसानों ने भाग लिया।

किसान नहीं जलाते अवशेष

दामला के किसान अनिल कुमार, साधुराम, रणसिंह, राजू, हरीश, अजय, बहादुरपुर के किसान लक्ष्मी चंद, वेद प्रकाश, इस्सरपुर के सतीश कुमार व मुकेश का कहना है कि खेतों में फसल अवशेषों का प्रबंधन करने के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। यदि हम अवशेषों को खेतों में ही गला दें तो खाद का बेहतर विकल्प तैयार होता है। वे खेत में फसल अवशेषों को नहीं जलाते। फानों के बीच ही हैप्पी सीडर या सुपरसीडर से गेहूं की बिजाई करते हैं। हर साल अच्छी पैदावार रहती है। खेत की तैयारी पर आने वाले खर्च भी घट जाता है। फोटो : 11

फानों में ही करें गेहूं की बिजाई

कृषि विज्ञान केंद्र दामला के वरिष्ठ संयोजक डा. एनके गोयल का कहना है कि धान के खड़े फानों में गेहूं की सीधी बिजाई हैप्पी सीडर, जीरो ड्रिल व सुपर सीडर से की जा सकती है। इसके अलावा स्ट्रा चापर, मल्चर, मिट्टी पलटू हल फसल अवशेष प्रबंधन में उपयोगी हैं। फसल अवशेष प्रबंधन के लिए जो किसान बेलर की सहायता से गांठ बनाकर रखना चाहता है, उसके लिए कृषि विभाग अनुदान स्वरूप यह सुविधा दी जा रही है। उनका कहना है कि खेतों में फसल अवशेषों को जलाने पर कार्रवाई भी हो सकती है। इसलिए किसान अवशेष न जलाएं। फोटो : 12

खेत में करें फसल अवशेषों का प्रबंधन

कृषि वैज्ञानिक डा. अजीत सिंह का कहना है कि फसल अवशेष जलाने से जमीन में आर्गेनिक कार्बन खत्म हो जाता है। इसे जमीन की आत्मा माना गया है। आर्गेनिक बढ़ाने से फसल की पैदावार बढ़ेगी। यह उपजाऊ शक्ति को बढ़ाता है। पराली जलाने से होने वाले पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। अस्थमा के मरीज बढ़ रहे हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत बच्चे और बुजुर्गों को हो रही है। इसलिए किसान फसल अवशेषों को न जलाएं बल्कि खेत में ही प्रबंधन करें। फोटो : 13

चारे के तौर पर करते प्रयोग

किसान राजू का कहना है कि फसल अवशेष जलाने से पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ रहा है और भूमि की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित हो रही है। उन्होंने आज तक खेतों में अवशेषों को नहीं जलाया। फसल अवशेषों को चारे के तौर पर भी प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही खेत में गलाकर पोषक तत्वों की आपूर्ति भी की जा सकती है। फोटो : 14

नहीं जलाते अवशेष

दामला के किसान अनिल कुमार का कहना है कि वह हर साल 20-25 एकड़ में धान की रोपाई करते हैं। उन्होंने आज तक फसल अवशेषों को खेतों में नहीं जलाया। धान के अवशेषों के बीच ही गेहूं की बिजाई करते हैं। अच्छी पैदावार होती है। किसानों को चाहिए कि फसल अवशेष न जलाएं।

Edited By: Jagran