पहले नेताओं में त्याग की भावना थी। राजनीतिक उनके लिए व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा भाव था। जो कहते थे वह पत्थर पर लकीर के बराबर होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। नेता स्वार्थी हो गए हैं। केवल लेना जानते हैं, देना नहीं। किसान हित की बात की जाती थी, लेकिन अब किसान को केवल वोट के लिए इस्तेमाल किया जाता है। सत्ता में आने से पहले उनसे दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन सरकार बनने के बाद किसानों से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा जाता।

मैंने राजनीति में सक्रियता तो नहीं दिखाई, लेकिन नेताओं को चुनावी प्रचार करते हुए देखा है। हम तो अपने काम में मस्त रहते थे। नेता गांव में आते थे, लेकिन हमारे समय में सादगी होती थी। दिखावा नहीं होता था। किसी नेता का गांव में आना भी बड़ी बात मानी जाती थी। बुजुर्गों से बातचीत करते थे। उनका हालचाल जानते थे। राजनीतिक का स्तर ऊंचा था। मर्यादा में रहकर ही नेता एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते थे। अब तो हालात ऐसे हैं कि नेता अपने स्वार्थ के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकते हैं। दूसरा, परिवार का मुखिया ही यह तय करता था कि वोट किसको डालना है। जहां मुखिया कहता था, पूरे परिवार की वोट वहीं डलती थी। एक वोट भी इधर-उधर नहीं होती थी। वह समय अच्छा था, लेकिन हमारे नेता आज के दौर को अच्छा मानते हैं। मैं तो यही कहूंगा कि नेताओं को जनता से किए वादे निभाने चाहिए। जनता के साथ वादाखिलाफी नहीं करनी चाहिए।

फकीर चंद देवधर,

Posted By: Jagran

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