जागरण संवाददाता, कपालमोचन : इसके बाद ही सोमसर सरोवर का नाम कपालमोचन पड़ा था। कपालमोचन नाम पड़ने पर ही यहां मेला लगना शुरू हुआ था। जब यहां मेला लगने की शुरुआत हुई तो गुरु नानक देव पहली बार मेले में आए थे। सिख इतिहास के मुताबिक गुरु नानक देव जी ज्यादातर ऐसी जगह ही जाते थे जहां पर मेले लगते थे, ताकि वे लोगों से मिल सके। मेला खत्म होने तक वे यहीं रुके थे।

कपालमोचन से हुई थी सिरोपा देने की शुरुआत

हिमाचल प्रदेश के पौंटा साहिब में जब भंगानी का युद्ध शुरू होने से पहले और युद्ध जीतने के बाद गुरु गोबिद सिंह दो बार कपालमोचन में आए थे। उन्होंने कपालमोचन में 52 दिन विश्राम किया था। कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने के बाद जिस ऋणमोचन सरोवर में पांडवों ने अपने शस्त्र धोये थे, उसी में गुरु गोबिद सिंह जी ने भी अपने शस्त्र धोये। तब जिन सिख सैनिकों ने भंगानी युद्ध में अपनी कुर्बानी दी और जो उनके साथ रहे उन्हें सम्मानित करने के लिए गुरु गोबिद सिंह ने सिरोपा देने की शुरुआत यहीं से की थी। सिरोपा मतलब सिर से पांव तक का सम्मान। इसलिए सिख समुदाय द्वारा जब किसी को सिरोपा दिया जाता है तो उसकी लंबाई सिर से लेकर घुटनों से नीचे तक होती है।

केसरी हो गया था सिरोपा का रंग :

बताया जाता है कि गुरु गोबिद सिंह द्वारा सिरोपा दिए जाने की परंपरा तब के शासकों को रास नहीं आई। इसलिए उन्होंने सिख समुदाय को सिरोपा के लिए कपड़ा देना बंद कर दिया था। इसलिए कुर्बानी देने वाले काफी सैनिकों को वे सिरोपा नहीं दे पाए। क्योंकि उस वक्त सभी लोग सिर पर पगड़ी पहनते थे। इसलिए उन्होंने सिरोपा के कपड़े के लिए अपनी पगड़ी दी थी। पगड़ी के कपड़े को शुद्ध करने के लिए गुरु गोबिद सिंह ने पगड़ी को सरोवर में धोया था। धोने के बाद इन कपड़ों का रंग केसरी हो गया था। यहीं से लोगों को केसरी सिरोपा दिया जाने लगा।

गोबिद सिंह ने बताया था गुरु नानक देव का आगमन दिवस

गुरु नानक देव का जन्मोत्सव कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था और वे मेला के दौरान कपालमोचन में आए थे। इसलिए गुरु गोबिद सिंह ने सबसे पहले गुरु नानक देव का आगमन दिवस कपालामोचन में मनाया था। तब गोबिद सिंह ने लोगों को उपदेश दिया था कि जो भी श्रद्धाभाव से कपालमोचन में आकर कोई भी मनोकामना मांगेगा वह जरूर पूरी होगी। इसलिए हर साल कार्तिक पूर्णिमा पर कपालमोचन में लाखों लोग आकर माथा टेकते हैं।

Posted By: Jagran

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