जागरण संवाददाता, यमुनानगर: कथा व्यास विजेंद्र शास्त्री ने बृहस्पतिवार को कनालसी गांव में भगवान कृष्ण के जन्म की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि लोभ को मारना अति कठिन है। यह वृद्धावस्था में भी पीछा नहीं छोड़ता। सत्कर्म में भी लोभ ही विघ्नकर्ता है। लोभ मरता है संतोष से, इसलिए संतोष की आदत डालनी चाहिए। प्रत्येक जीव में प्रभु ने प्रवेश किया है, अत: सारा जगत परमात्मा का मंगलमय स्वरुप है। भगवान की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ जिसमें से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया, काम को जन्म दिया। काम ने प्रथम पिता को मोहित किया। प्रथम हुए स्वायंभुव मनु और शतरूपा रानी। तभी से प्रजा की वृद्धि होने लगी। सर्वशक्तिमान श्रीहरि ने गर्जना से दिशाओं को प्रतिध्वनित करके ब्रह्मा और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को हर्ष से भर दिया। प्रेम व करुणा भरी उस स्तुति को सुनकर, सबकी रक्षा करने वाले वराह भगवान ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। उसमें अपनी आधार शक्ति का संचार भी किया। रसातल से लीलापूर्वक लायी हुई पृथ्वी को जल पर रखकर वे विष्वकसेन प्रजापति भगवान अन्तध्र्यान हो गए। पृथ्वी उन्होनें मनु को अर्थात मनुष्य को सौंप दी। जो कुछ अपने हाथों में आया उसे औरों को दे दिया यही संतोष है। इस अवसर पर शिव मंदिर कमेटी के अध्यक्ष सुरेंद्र सिंह, किरण सिंह, डॉ. राजवीर सिंह आदि उपस्थित थे।

Posted By: Jagran

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