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पोपीन पंवार, यमुनानगर

इस बार भी बाढ़ आने पर बचाव कार्य बरसात में बहेंगे। जनवरी माह के दस दिन दिन निकल गए, लेकिन बाढ़ बचाव के लिए होने वाले कार्यो को लेकर बैठक नहीं हुई। जून माह में बरसात शुरू हो जाती है, जबकि प्रस्ताव पास करने, सर्वे और टेंडर होने में पांच से छह माह का समय लग जाता है। बरसात के मौसम में काम शुरू होते ही ठेकेदार अधिकारियों से मिलीभगत कर कहते हैं कि कार्य पानी में बह गए। हर साल करीब दस करोड़ रुपये का नुकसान हो जाता है। यमुनानगर समेत करनाल, अंबाला और सोनीपत में यही हालात बनते हैं। इन जिलों में ही बाढ़ बचाव के कार्य सबसे अधिक होते हैं। यमुनानगर में डीसी गिरीश अरोड़ा ने शनिवार को मालीमाजरा, कलेसर, नवाजपुर व बाबूरामबांस में घाटों का दौरा किया। हालांकि साइट मी¨टग के बाद ही तय होनी है।

आठ साल में 90 करोड़ खर्च

आठ वर्ष में जिले में बाढ़ बचाव कार्यो पर 90 करोड़ खर्च किए गए। बावजूद इसके मौके से तटबंध गायब है। हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद भी लोग बाढ़ की मार झेलते हैं, क्योंकि कभी यह कार्य भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ते हैं तो कभी सरकारी प्रक्रिया में देरी होने से पूरे नहीं हो पाते।

बरसात का मौसम आने पर होते कराते हैं कार्य शुरू

बाढ़ बचाओ के कार्य हर बार बरसात का मौसम आने पर शुरू होते हैं। इसी बीच बरसात शुरू होने पर नदी में पानी आ जाता है। जिसके बाद अधिकारी बहाना बना देते हैं कि बाढ़ बचाव के किए गए कार्य यमुना नदी में पानी आने से बह गए। इतना ही नहीं कार्य के साथ मशीनरी तक का नुकसान भी गिना देते हैं। पिछले कई सालों से यह व्यवस्था चल रही है। जिस वजह से एक ही साइट पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, मगर वहां पर तटबंध तैयार नहीं हो पाता।

खामी है व्यवस्था में : कार्य शुरू करने के लिए लग जाते है सात महीने

हरियाणा फ्लड कंट्रोल बोर्ड बाढ़ बचाओ की रूपरेखा तैयार करता है। नए कार्यो के लिए पंचायत से सुझाव आते है। इसके लिए ¨सचाई विभाग को प्रभावित गांव में सूचना देनी होती है। अधिकारियों ने सूचना देने में देरी की, जिस कारण पंचायत के सुझाव देरी से आते है। लोगों की शिकायतें डीसी के समक्ष जाती हैं। जिसके बाद अफसर दौरा करते हैं। साइट का चयन के बाद पंचायतों से रेजुलेशन लिया जाता है। जिला स्तर से कार्यो का एस्टीमेट तैयार कर एसई व चीफ इंजीनियर के पास जाता है। यहां पर भी बाढ़ बचाव कार्यो के लिए स्थानों का चयन होता है। फिर टेक्निकल कमेटी के पास मामला जाता है। इसमें सभी जिलों के डीसी पहुंचते हैं। सभी प्रक्रिया पूरी होने पर सीएम की अध्यक्षता में फ्लड कंट्रोल बोर्ड मी¨टग में एस्टीमेट रखे जाते हैं।

मी¨टग में फाइनल होने के बाद चीफ इंजीनियर के पास फाइल दोबारा जाती है। फिर एस्टीमेट बनते हैं। उसके बाद टेंडर कॉल 20 से 30 दिन और इसे पास होने में 20 से 25 दिन लग जाते हैं। उसके बाद पत्थर एक स्थान पर एकत्र कर उसकी पैमाइश की जाती है। तब तक बरसात शुरू हो जाती है और पैसे पानी में बह जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में सात माह से अधिक का समय लग जाता है।

ये होनी चाहिए व्यवस्था

दबी जुबान में अधिकारियों का कहना है कि बोर्ड की मी¨टग नवंबर माह में होनी चाहिए। एजेंडा पास करने के साथ, एस्टीमेट व टेंडर कॉल इसी मी¨टग में तय होने चाहिए। बाढ़ बचाव के कार्य जनवरी माह में शुरू होने चाहिए। सरकार से अनुमति लेने के बाद पूरी प्रक्रिया जिला स्तर से लागू हो। जांच के लिए एजेंसी निगरानी रखे।

ये खर्च हो चुका है बाढ़ बचाओ पर

वर्ष रुपये 2011-12 : साढे़ 13 करोड़ 2012-13 : आठ करोड़ रुपये 2013-14 : साढे़ दस करोड़ 2014-15 : 17 करोड़ 2015-16 : 11 करोड़ 2016-17 : नौ करोड़ 2017-18 : 14 करोड़ 2018 - 19 : आठ करोड़

नोट : यह डाटा सिंचाई और वन विभाग से आरटीआइ में लिया गया है। सीएम के साथ 15 को होगी मी¨टग

¨सचाई विभाग के एसई विमल बिश्नोई का कहना है कि 15 को सीएम के साथ बाढ़ बचाव कार्यो के संबंध में मी¨टग प्रस्तावित है। सरकार के निर्देशों के मुताबिक ही कार्य किया जाएगा। इस बार यमुनानगर जिले में कम ही कार्यो का प्रस्ताव पास हुआ है। मी¨टग के बाद सही स्थिति पता लगेगी।

Posted By: Jagran

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