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जागरण संवाददाता, यमुनानगर : धान की कटाई जोरों पर है। एक ओर जहां किसान फसल समेटने में जुटे हैं, वहीं अधिकारी फसल अवशेष न जलाने का संदेश दे रहे हैं। उनका कहना है कि किसान अपने खेतों में पराली न जलाएं बल्कि खेतों में ही प्रबंधन करें। या फिर बेचकर पैसे कमाएं तथा पर्यावरण की रक्षा करें। उनका कहना है कि किसान अपने खेतों में धान की पराली को जला देते हैं जिससे की काफी मात्रा में प्रदूषण होता है तथा खेत की उर्वरा शक्ति कमजोर होती है। फोटो : 1

पराली जलाने से बंजर होती है जमीन : सुरेंद्र यादव

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के उप निदेशक डा. सुरेंद्र यादव का कहना है कि खेतों में फसल अवशेष जलाने से बीमारियां, मृदा की उर्वरा शक्ति घटना व मित्र कीटों का नष्ट होना, मुख्य समस्या बनी हुई है। आदेशों की पालना न करने पर प्रशासन की ओर से जुर्माना व कानूनी कार्रवाई करना शामिल है। उनका कहना है कि खेतों में जल रहे फसल अवशेष जमीन को बंजर कर रहे हैं। एक टन धान की पराली जलाने से मिट्टी में 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन सल्फर 12 किलोग्राम, पोटाश 2.3 किलोग्राम और आर्गेनिक कार्बन चार सौ किलोग्राम पोषक तत्वों की हानि होती है। प्रदूषित कण शरीर के अंदर जाकर फेफड़ों में सूजन सहित इंफेक्शन, निमोनिया और हार्ट की बीमारियां का कारण बनते हैं। खांसी, अस्थमा, डाइबिटीज के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। फोटो : 2

पराली बेच कर सकते हैं आमदनी : रणजीत कौर

एडीसी रणजीत कौर का कहना है कि पराली जलाने से वातावरण में जो प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है उसके कारण जनमानस की सांस की बिमारी, आखों में जलन, हृदय रोग, कैंसर इत्यादि गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। खेतों की उर्वरा शक्ति कमजोर हो रही है क्योंकि भूमि के उपरी स्तह पर ऐसे जीवाणु होते हैं जो जमीन की उर्वरा शक्ति को बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि किसान ऐसा मानते हैं कि खेतों में पराली जलाने से जहरीले कीटाणु समाप्त हो जाते हैं जबकि उनका यह मानना बिल्कुल गलत है। किसानों को अपने खेतों में धान की पराली जलाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब इस धान की पराली को खरीदने के लिए खरीददार उपलब्ध हैं। एक एकड़ धान की पराली पर किसान को दो हजार से 2500 रुपये की आमदनी होगी।

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