सोनीपत के बाबा जिंदा मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़, समाधि पर गुड़ और झाड़ू चढ़ाकर मांगी मन्नतें
गन्नौर के मोई गांव में बाबा जिंदा मेले में दूसरे दिन विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने समाधि पर गुड़ व झाड़ू चढ़ाकर मन्नतें मांगी।

श्रद्धालु मेले में पहुंचे।
HighLights
बाबा जिंदा मेले में श्रद्धालुओं ने समाधि पर माथा टेका।
गुड़ और झाड़ू चढ़ाकर पशुओं व घर की सुख-शांति मांगी।
मेले में बच्चों और महिलाओं ने खरीदारी व झूलों का आनंद लिया।
संवाद सहयोगी, गन्नौर। गांव मोई स्थित ऐतिहासिक तीर्थ स्थान बाबा जिंदा के मेले में दूसरे दिन विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं बाबा जिंदा की समाधि पर माथा टेका। मेले में पुख्ता पुलिस व्यवस्था होने से श्रद्धालुओं को किसी तरह की कोई परेशानी नहीं हुई।
डेरा के संचालक महंत बाबा बालकनाथ ने मेले में आए श्रद्धालुओं को उनके घर व पशुओं में सुख शांति के लिए डोरे व भभूत का प्रसाद देकर आशीर्वाद दिया। बाबा जिंदा पर लगे मेले में खिलौनों व मिठाइयों के स्टॉलों पर बच्चों व महिलाओं ने जहां जमकर खरीदारी की, वहीं बच्चों ने झूलों का भी आनंद लिया।
दूसरे दिन बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालु
मेले के दूसरे दिन काफी संख्या में श्रद्धालुओं ने गुड़ व झाडू चढ़ा कर मन्नतें मांगी। मान्यता है कि पशुओं में किसी भी तरह की बीमारी हो या फिर मनुष्य किसी भी तरह से परेशान हो तो बाबा जिंदा की समाधि पर सवा 5 किलो गुड़ व झाडू चढ़ा कर मन्न्तें मांगी जाती हैं। मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धालु यहां आकर गुड़ व दूध चढ़ाते है। भविष्य में उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न हो।
क्या है बाबा जिंदा की कथा
बाबा जिंदा के महंत बाबा बालकनाथ ने अनुसार करीब 300-400 वर्ष पहले मोई गांव के जाट (राणा) परिवार में चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को जसपाल का जन्म हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि भक्ति और ध्यान में थी। एक दिन पशु चराते समय उनकी मुलाकात नाथ संप्रदाय के संत बाबा मस्तनाथ से हुई।
बाबा के कहने पर जसपाल ने एक बिना ब्याही भैंस का दूध निकाला, जिससे खीर बनाई गई। खीर का अंश ग्रहण करने के बाद उनके मन में वैराग्य जागा और वे बाबा मस्तनाथ के पीछे अस्थल बोहर पहुंच गए। वहां उन्होंने गुरु से दीक्षा ली।
बाबा ने उन्हें गांव लौटने का आदेश देते हुए भविष्यवाणी की कि एक दिन वे धरती में समाकर जिंदा बाबा के नाम से पूजे जाएंगे। बाद में जसपाल गुरु की आज्ञा से जीवित समाधि लेने लगे।
उन्हें रोकने पहुंचीं उनकी भाभी भी उनके साथ धरती में समा गईं। मान्यता है कि इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम बाबा जिंदा धाम पड़ा।
