सोनीपत [दीपक गिजवाल]। भारतीय सेना को अपने अदम्य साहस के लिए जाना जाता है। ऐसा ही अदम्य साहस 11 मई, 2010 को जिले के गांव जौली-लाठ के विरेंद्र ने जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा के गांव सांझीपुर के पास आतंकियों से हुई मुठभेड़ में दिखाया था। मुठभेड़ में दो साथियों की शहादत और खुद घायल होने के बावजूद विरेंद्र ने अकेले ही चार आतंकियों को मार गिराया था। आपरेशन में जवानों ने 11 आतंकियों को मारकर साथियों की शहादत का बदला लिया था। बाद में विरेंद्र को अदम्य साहस के लिए सेना मेडल से नवाजा गया। भारतीय सेना की तीसरी महा रेजिमेंट के हवलदार विरेंद्र हाल में अरुणाचल प्रदेश में तैनात हैं।

विरेंद्र ने बताया कि सेना को गांव सांझीपुर के पास आतंकियों के मूवमेंट की सूचना मिली थी। टीम सर्च आपरेशन के लिए निकली थी। राष्ट्रीय राइफल की घातक प्लाटून के सिपाही विरेंद्र भी टीम का हिस्सा थे। अचानक ही सेना की गाड़ियों पर फायरिंग होने लगी। इस दौरान उनके दो साथी शहीद हो गए। विरेंद्र ने बताया कि जब वे जवाबी कार्रवाई कर रहे थे तो उनके सिर पर बंधे बुलेट प्रूफ पट्टे पर तीन गोलियां लगीं।

वहीं, गोलियों के र्छे हाथ में लग गए। घायल होने के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, बल्कि साथियों की शहादत का बदला लिया। विरेंद्र ने अकेले ही चार आतंकी मार गिराए। आपरेशन में कुल 11 ढेर हुए थे जिसके बाद तत्कालीन सेना अध्यक्ष जरनल वीके सिंह ने विरेंद्र को सीने पर मेडल लगाकर सेना अवार्ड से सम्मानित कर उनके साहस की सराहना की थी। वहीं, ब्रिगेडियर पीडी हालूर ने भी विरेंद्र को सम्मानित किया। तत्कालीन उपायुक्त एवं जिला सेना बोर्ड के अध्यक्ष पंकज अग्रवाल ने पांच लाख का चेक देकर उनके साहस को सलाम किया था।

सूडान में भी सेवाएं दे चुके हैं विरेंद्र

आतंकियों से लोहा लेने के बाद रेजिमेंट में विरेंद्र के साहस की चर्चा होने लगी थी। हालांकि इससे पहले विरेंद्र शांति सेना के साथ सूडान जा चुके थे। इसके बाद फिर से उनको शांति सेना के साथ दूसरे देश भेजा गया। विरेंद्र भारतीय सेना के कई अंतरराष्ट्रीय आपरेशन में हिस्सा ले चुके हैं।

Edited By: Mangal Yadav