सोनीपत की नैंसी ने रचा इतिहास, शादी के बाद भी 14 घंटे पढ़ाई कर CSIR-UGC JRF में हासिल किया AIR-1
सोनीपत की नैंसी ने शादी के बाद भी पढ़ाई जारी रखते हुए सीएसआईआर-यूजीसी जेआरएफ परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल ...और पढ़ें

सीएसआईआर-यूजीसी नेट जेआरएफ में आल इंडिया रैंक-1 लाने वाली नैंसी। जागरण
HighLights
नैंसी ने सीएसआईआर-यूजीसी जेआरएफ में ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल की।
शादी के बाद भी पीएचडी और शोध कार्य जारी रखा।
सफलता का श्रेय परिवार और ससुराल पक्ष के सहयोग को दिया।
संवाद सहयोगी, गन्नौर (सोनीपत)। शादी के बाद पढ़ाई और शोध जारी रखते हुए ठरू गांव की 27 वर्षीय नैंसी ने सीएसआईआर-यूजीसी जूनियर रिसर्च फेलोशिप (जेआरएफ) परीक्षा में आल इंडिया रैंक-1 हासिल की है। मूल रूप से पानीपत की रहने वाली नैंसी पिछले करीब चार वर्षों से इस परीक्षा की तैयारी कर रही थीं।
वर्तमान में वह शिव नादर विश्वविद्यालय से फिजिक्स में पीएचडी के अंतिम वर्ष में हैं और प्रोफेसर बनने की तैयारी कर रही हैं। नैंसी की शादी करीब दो वर्ष पहले ठरू गांव निवासी अमित से हुई थी। शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ाई और शोध को प्राथमिकता दी।
वह विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहकर अपनी पीएचडी पूरी कर रही हैं। नैंसी ने मुरथल स्थित दीनबंधु छोटूराम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय से फिजिक्स में एमएससी की थी। यहां प्रवेश परीक्षा में भी उन्होंने रैंक-1 हासिल की थी। एमएससी करने के बाद उन्होंने पीएचडी में दाखिला लिया। शोध कार्य के सिलसिले में वह जर्मनी भी जा चुकी हैं।
ऑनलाइन कोचिंग के साथ सेल्फ स्टडी
नैंसी के अनुसार जेआरएफ की तैयारी उन्होंने आनलाइन कोचिंग और सेल्फ स्टडी के माध्यम से की। विश्वविद्यालय में सुबह नौ से शाम पांच बजे तक कक्षाओं और शोध कार्य में व्यस्त रहने के बाद वह लाइब्रेरी में पढ़ाई करती थीं।
परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने नियमित रूप से प्रतिदिन करीब 14 से 16 घंटे या कभी-कभी इससे ज्यादा समय तक भी पढ़ाई की। पढ़ाई के साथ शोध कार्य को संतुलित करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन उन्होंने तैयारी का क्रम नहीं टूटने दिया। नैंसी का कहना है कि उनका अगला लक्ष्य शोध के क्षेत्र में आगे बढ़ने के साथ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बनना है।
ससुराल पक्ष को दिया श्रेय
नैंसी ने अपनी सफलता का श्रेय ससुर अशोक कुमार और सास सरोज बाला समेत पूरे परिवार को दिया। उन्होंने कहा कि ससुराल पक्ष ने उन्हें कभी बहू के रूप में सीमित नहीं किया, बल्कि हमेशा बेटी की तरह प्रोत्साहित किया।
पढ़ाई और शोध के लिए परिवार ने हर स्तर पर सहयोग किया और आर्थिक मदद करने में भी कभी पीछे नहीं हटे। उनका मानना है कि विवाह के बाद भी यदि परिवार का सहयोग मिले और लक्ष्य स्पष्ट हो तो पढ़ाई और करियर की राह जारी रखी जा सकती है।
