CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका को बताया लोकतंत्र की रीढ़, जिला अदालत की चुनौतियों पर डाला प्रकाश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायपालिका को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार बताया है। उन्होंने जिला अदालतों की चुनौतियों, जैसे बुनियादी ढांचे की कमी और लंबित मामलों पर प्रकाश डाला। उन्होंने इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर दिया, ताकि नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके।

CJI सूर्यकांत। फाइल फोटो
जागरण संवाददाता, सोनीपत। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआइ) सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ है और इसकी स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला कोई भी हस्तक्षेप संविधान की आत्मा पर चोट माना जाएगा। सीजेआइ शनिवार को ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विश्व के सबसे बड़ा मूट कोर्ट 'न्यायाभ्यास मंडपम्' राष्ट्र को समर्पित किया गया। इसे ईमानदार नाम दिया गया है, जो विद्यार्थियों को वास्तविक न्यायालय जैसे माहौल में वाद-विवाद, वकालत, मध्यस्थता और विवाद समाधान का अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण प्रदान करेगा। बता दें कि मूट कोर्ट नकली अदालतें होती हैं जिनमें कानून के छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए काल्पनिक मामलों की सुनवाई की जाती है।
केशवानंद भारती केस का हुआ मंचन
उद्घाटन के तुरंत बाद भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण मुकदमे केशवानंद भारती केस का मंचन किया गया। इसमें देश के अटार्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, सालिसिटर जनरल तुषार मेहता और वरिष्ठ अधिवक्ता डा. अभिषेक मनु ¨सघवी व सिद्धार्थ लूथरा ने हिस्सा लिया।
इसके बाद पहली बार 13 सुप्रीम कोर्ट जजों ने एक साथ इस फैसले और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर विचार रखे। सीजेआइ ने कहा कि संविधान की मूल संरचना फ्रीडम, लोकतंत्र, सेकुलरिज्म, न्याय न तो कमजोर की जा सकती है और न बदली जा सकती है।
ज्यूडिशियल रिव्यू न्यायपालिका की सबसे बड़ी ताकत है और यह कायम रहेगी। भारतीय संविधान की चारपाई से तुलनासीजेआइ ने संविधान को चारपाई से तुलना करते हुए कहा कि इसकी मजबूती- कठोरता और लचीलेपन के संतुलन में है।
रस्सियां ज्यादा कसीं तो टूट जाएंगी, ढीली छोड़ीं तो ढह जाएगी। यही संतुलन भारत को युवा गणराज्य होते हुए भी परिपक्व लोकतंत्र बनाता है। सम्मेलन के दौरान विशिष्ट अतिथि कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल रहे।
असली चुनौती जिला अदालतों के स्तर पर
वहीं प्रेट्र के अनुसार, बार काउंसिल आफ इंडिया द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में सीजेआइ सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका के सामने असली चुनौती जिला अदालतों के स्तर पर है, जो न्याय चाहने वाले अधिकांश नागरिकों के लिए संपर्क का पहला पड़ाव हैं। किसी भी व्यवस्था की पहली चिंता यह होती है कि जिला अदालत वादियों को न्याय दिलाने में सक्षम हो।
उन्होंने कहा कि 70 प्रतिशत वादी जिला स्तर पर ही अपना भाग्य तय किए जाने की उम्मीद करते हैं। उधर, आल इंडिया जज बैडमिंटन चैंपियनशिप के उद्घाटन समारोह में जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि न्यायाधीशों के काम के घंटे लंबे होते हैं। साथ ही उनका काम भी बहुत तनावपूर्ण होता है। इसलिए खुद को ऊर्जावान बनाए रखने के लिए उन्हें मनोरंजक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए। साथ ही इसे अपनी आदत में शुमार कर लेना चाहिए।
केवल इसलिए निर्णयों पर दोबारा विचार नहीं हो क्योंकि जज बदल गए हैं: न्यायमूर्ति नागरत्नाप्रेट्र के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की जज बीवी नागरत्ना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि उन्हें लिखने वाले जज बदल गए हैं।
उन्होंने कहा, कानूनी बिरादरी और गवर्नेंस फ्रेमवर्क के कई लोगों की यह ड्यूटी है कि वे फैसले का सम्मान करें, कानून में शामिल परंपराओं के अनुसार ही आपत्ति उठाएं और सिर्फ इसलिए उसे खारिज करने की कोशिश न करें क्योंकि चेहरे बदल गए हैं।
न्यायपालिका स्वतंत्र ही नहीं, सक्षम भी होनी चाहिए: मेघवाल
कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया कि डा. बीआर आंबेडकर की महत्वपूर्ण दलीलों के कारण तिरंगे में चरखे के स्थान पर अशोक चक्र जोड़ा गया। अशोक चक्र की चौबीस तीलियां निरंतरता, समानता, न्याय और दया आदि उच्च मानवीय मूल्यों की द्योतक हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका सिर्फ स्वतंत्र नहीं, बल्कि सक्षम भी होनी चाहिए।

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