जागरण संवाददाता, रोहतक : 19 अप्रैल को दोपहर में करीब एक बजा होगा। शिप में सवार स्टाफ क्लीयररेंस का इंतजार कर रहा था, तभी शिप के पास एक बोट आकर रूकी और चेहरे पर मॉस्क ढके एक के बाद एक नौ समुंद्री लुटेरे उनके शिप में चढ़ गए। आते ही उन्होंने मुझ समेत पांचों भारतीयों को बंधक बनाकर अपनी बोट में बैठा लिया। हाथ-पैर बांधकर उनकी आंखों में पट्टी दी गई और फिर करीब छह-सात घंटे तक बोट चलती रही। रात के समय जाकर उन्हें एक आइलैंड पर उतारा गया और वहीं पर बंधक बना लिया गया। उन्हें न समय पर खाना मिलता था और पीने के लिए केवल समुंद्र का पानी था। उनके अत्याचारों को देखकर तो घर वापस लौटने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, लेकिन सभी की दुआएं की बदौलत ही आज अपने घर लौटा हूं। यह कहना है कि समुंद्री लुटेरों के चंगुल से छूटकर करीब ढाई माह बाद घर लौटे रोहतक के आसन गांव निवासी अंकित हुड्डा का। यह था मामला

19 अप्रैल को आइलैंड के पास समुंद्री लुटेरों ने नाइजीरिया जा रहे शिप का अपहरण कर लिया था। जिसमें आसन गांव निवासी अंकित हुड्डा समेत पांच लोग भारतीय मूल के थे। पिछले सप्ताह शुक्रवार को दो माह आठ दिन बाद समुंद्री लुटेरों ने बंधनमुक्त कर दिया था। सोमवार को अंकित व अन्य सभी लोग मुंबई पहुंचे। वहां पर दो दिनों तक नेवी के अधिकारियों ने उनसे पूरे मामले की जानकारी ली, जिसके बाद बुधवार शाम वह फ्लाइट से दिल्ली पहुंचा और देर रात तक रोहतक के तिलक नगर स्थित अपने मामा के घर आया। एयरपोर्ट पर बेटे को देख बिलख पड़ी मां

जिस दिन से अंकित के बंधक होने की सूचना मिली थी तभी से उसी मां ऊषा का रो-रोकर बुरा हाल था। बुधवार को वह दिल्ली एयरपोर्ट पर खुद अपनी बेटे को लेने के लिए गई थी। एयरपोर्ट पर जैसे ही बेटे को देखा तो वह उससे लिपटकर बिलख उठी। वह बार-बार अपने बेटे को दुलार रही थी। परिवार के अन्य सदस्य भी एयरपोर्ट पर उसे लेने के लिए गए हुए थे। जो देर रात रोहतक लौटे। चार किलोमीटर जंगल और कीचड़ में भागे पैदल, स्थानीय लोगों ने दी बोट, तब पहुंचे मंजिल तक

दैनिक जागरण से बातचीत में अंकित हुड्डा ने बताया कि शुरूआत में समुंद्री लुटेरों की संख्या नौ थी, लेकिन इसके बाद आइलैंड पर उनके अन्य साथी भी थे। जिनकी संख्या करीब 70 के आसपास थी। वह हर समय अपने चेहरे पर मॉस्क रखते थे और सभी बंधकों की आंखों पर पट्टी बंधी रहती थी। उन्हें कभी-कभार खाना दिया जाता था और पीने के नाम पर केवल समुंद्र का पानी।

दो माह आठ दिन की अवधि में एक बार घर फोन पर बात कराई, तब भी इसलिए कि हाईकमीशन का नंबर मिल सके। उनके साथ मारपीट भी की जाती थी। जिस तरीके से वह अत्याचार कर रहे थे उससे घर आने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। पिछले सप्ताह अचानक शाम चार बजे कहा कि तुम लोग रिहा हो और यहां से जा सकते हो। कुछ दूर तक उन्होंने एक जंगल में लाकर छोड़ दिया। करीब चार किलोमीटर तक जंगल और कीचड़ में पांचों लोग चलते रहे। फिर कुछ आबादी दिखाई दी। वहां के स्थानीय लोगों ने मदद की और बोट का बंदोबस्त कर उन्हें मंजिल तक पहुंचने में मदद की।

Posted By: Jagran

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