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3 साल की उम्र में हुआ पोलियो, दिव्यांगता को मात दे रोहतक की शालू बनीं प्रेरणा, जरूरतमंद बच्चों की संवार रहीं जिंदगी

Published: Sun, 11 Oct 2026 09:13 AM (GMT+05:30)

शालू अरोड़ा ने बचपन में पोलियो से मिली दिव्यांगता को मात देकर आत्मनिर्भरता हासिल की। अब वह पिछले 20 वर्षों ...और पढ़ें

रोहतक की शालू अरोड़ा का अनोखा जज्बा।

रोहतक की शालू अरोड़ा का अनोखा जज्बा।

HighLights

  1. तीन साल की उम्र में पोलियो से हुई दिव्यांगता को हराया

  2. 20 वर्षों से जरूरतमंदों को भोजन और बच्चों को शिक्षा दे रहीं

  3. 'माय ट्रस्ट' के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की तैयारी

प्रियंका देशवाल, रोहतक। मुश्किलें कितनी भी हों, अगर इरादे मजबूत हों तो रास्ते खुद बन जाते हैं। शहर के विकास नगर निवासी शालू अरोड़ा इसकी मिसाल हैं। करीब तीन साल की उम्र में पोलियो होने के कारण कमर में परेशानी होने से उनके लिए चलना-फिरना आसान नहीं रहा।

हालांकि उन्होंने शारीरिक चुनौती को कभी अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। आत्मनिर्भर बनने के साथ जरूरतमंदों की मदद को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।

12 वर्षों से महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में नान टीचिंग स्टाफ के तहत असिस्टेंट के पद पर कार्यरत शालू पिछले करीब दो दशक से जरूरतमंदों को भोजन करा रही हैं। अब गरीब परिवारों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने और जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए भी प्रयासरत हैं। इसी सोच के साथ वह समाज सेवा के कार्यों में जुटी हुई है।

खुद स्कूटी चलाना सीखा

शालू ने बताया कि बचपन में करीब तीन साल की उम्र में पोलियो होने के कारण उनकी कमर में परेशानी हो गई थी। कहीं आने-जाने के लिए उन्हें दूसरों का सहारा लेना पड़ता था, लेकिन उन्होंने अपनी इस निर्भरता को कम करने का फैसला किया। इसके लिए स्कूटी चलाना सीखा।

शालू ने बताया कि परिवार में धार्मिक विचारों का माहौल रहा और माता-पिता से उन्होंने दूसरों की मदद करने की सीख ली। इसी प्रेरणा के चलते वह जरूरतमंद लोगों के लिए अपने स्तर पर भोजन तैयार कराती है।

पिछले करीब 20 वर्षों से वह खुद खाना बनाकर जरूरतमंदों को खिला रही हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहते बच्चों तक भोजन पहुंचाने जाती हैं।

15 बच्चों को दे रहीं शिक्षा

शालू ने जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। उन्होंने बताया कि वह दिल्ली बाईपास स्थित झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए करीब एक साल तक प्रतिदिन जाती थी।

अब वह अपने आसपास के घरों में काम करने वाली महिलाओं के बच्चों को पढ़ा रही हैं। उनके पास पढ़ रहे 15 बच्चों में 12 लड़कियां हैं। शालू का मानना है कि आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे की पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए। खासकर लड़कियों को शिक्षा के अवसर मिलना जरूरी है।

इसी सोच के साथ उन्होंने दो वर्षों पहले माय ट्रस्ट की शुरुआत की और अब इसके माध्यम से महिलाओं को रोजगार देने की तैयारी कर रही है। अब उनका लक्ष्य उन महिलाओं को रोजगार से जोड़ना है, जो किसी कारणवश घर से बाहर जाकर काम नहीं कर पातीं। इसके लिए वह डिस्पोजल मशीन लगाने की योजना बना रही हैं।

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