पिता की मौत, मां ने दूध बेचकर बेटी का उठाया खर्च; रोहतक की परवीन हुड्डा ने एशियन गेम्स में सोना जीतकर किया सपना पूरा
परवीन हुड्डा ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। आर्थिक तंगी और कई चुनौतियों ...और पढ़ें

परवीन हुड्डा के गोल्ड जीतने पर खुशी मनाती मां। फोटो जागरण
HighLights
परवीन हुड्डा ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, संघर्षों से भरी रही यात्रा।
मां ने भैंसों का दूध बेचकर बेटी के बॉक्सिंग करियर को संभाला।
कई चुनौतियों और निलंबन के बाद परवीन ने शानदार वापसी की।
जागरण संवाददाता, रोहतक। कभी दूसरे खिलाड़ियों के पुराने ग्लव्स पहनकर रिंग में उतरने वाली गांव रुड़की की बेटी परवीन हुड्डा ने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। बचपन में खुद को मजबूत बनाने के लिए बाक्सिंग शुरू करने वाली परवीन का यह सफर संघर्ष और परिवार के त्याग की मिसाल है।
आर्थिक तंगी के कारण जब खेल का खर्च उठाना मुश्किल था, तब मां नीलम ने 60 हजार रुपये का लोन लेकर भैंस खरीदी, ताकि उसके दूध बेच कर बेटी के खेल का खर्च उठाया जा सके और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उसके सपनों को टूटने नहीं दिया।
आज उसी बेटी ने 65 किलोग्राम भारवर्ग के फाइनल में चीनी ताइपे की चेन निएन-चेन को 3-2 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया है। खास बात यह है कि परवीन ने करीब डेढ़ साल तक बाक्सिंग से दूर रहने, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निलंबन झेलने, चयन से चूकने और लगातार निराशाओं के बाद शानदार वापसी करते हुए यह उपलब्धि हासिल की है।
खुद को मजबूत बनाने के उद्देश्य से सीखी बॉक्सिंग
परवीन ने बताया कि वर्ष 2012 में गांव के स्टेडियम में दूसरे खिलाड़ियों को बाक्सिंग का अभ्यास करते देखकर उनकी भी इस खेल में रुचि जागी। बचपन में स्कूल में अकसर लड़ाई हो जाती थी। ऐसे में खुद को मजबूत बनाने के उद्देश्य से उन्होंने बाक्सिंग सीखने का फैसला किया।
गांव के सरपंच व कोच सुधीर ने उन्हें शुरुआती प्रशिक्षण दिया और पुराने ग्लव्स उपलब्ध कराए। इन्हीं ग्लव्स से परवीन ने अपने खेल का सफर शुरू किया। किसान परिवार से होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नही थी। जब भी उन्हें नए ग्लव्स या जूतों की जरूरत होती, तो परिवार को दूध बेचकर पैसे जुटाने का इंतजार करना पड़ता था।
पुरस्कार राशि से बनाया घर
परवीन ने अपनी मेहनत से न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई, बल्कि विश्व और एशियाई प्रतियोगिताओं में मिली पुरस्कार राशि से परिवार के लिए घर भी बनाया। वर्ष 2023 में पिता को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी होने के कारण परिवार को मुश्किल दौर से गुजरना पड़ा। इसके बावजूद परवीन ने अपने खेल पर ध्यान बनाए रखा। परिवार ने भी हर कठिन परिस्थिति में उनका साथ दिया।
वहीं, इसके बाद व्हेयरअबाउट्स से जुड़ी विफलताओं के कारण अंतरराष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के 22 महीने के निलंबन के चलते उन्हें बाक्सिंग से दूर रहना पड़ा। जिसके बाद परवीन के लिए वापसी का रास्ता आसान नहीं था। इस दौरान वह पूरी तरह निराश हो गई थी और करीब एक महीने तक अभ्यास भी नहीं किया।
वर्ष 2024 में बेहतर प्रशिक्षण और माहौल के लिए परिवार ने गांव छोड़कर रोहतक शहर में रहने का फैसला किया और बेटी को प्रैक्टिस के लिए प्रेरित करते रहे।
जिकसे बाद वर्ष 2025 में आल इंडिया पुलिस प्रतियोगिता के बाद उन्होंने दोबारा खेल में पूरी ताकत से वापसी करने का फैसला किया। जुलाई 2025 से उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) रोहतक में अभ्यास शुरू किया।
इस दौरान नौकरी के साथ प्रशिक्षण जारी रखना भी उनके लिए चुनौती थी। परवीन के बताया कि कुछ लोगों और यहां तक कि एक कोच ने भी उनकी वापसी पर संदेह जताया था, लेकिन उन्होंने खुद पर भरोसा बनाए रखा और नए सिरे से तैयारी शुरू की। वापसी के महज दो महीने बाद ही विश्व मुक्केबाजी कप फाइनल्स में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी क्षमता साबित किया।
चयन से चूकने के बाद एक महीने में बढ़ाया पांच किलो वजन
वहीं निलंबन के बाद वापसी के दौरान परवीन को व्यक्तिगत जीवन में भी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इसी दौरान मौसी के बेटे की मृत्यु से वह काफी प्रभावित हुईं। जनवरी में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उनका प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। इसके बाद 60 किलोग्राम भारवर्ग में एशियन चैंपियनशिप के ट्रायल में भी उनका चयन नहीं हो सका।
हालांकि, उन्होंने हार मानने के बजाय नई चुनौती स्वीकार की और महज एक महीने में अपना वजन 60 से बढ़ाकर 65 किलोग्राम कर लिया। इसके बाद कामनवेल्थ चैंपियनशिप के ट्रायल में शानदार प्रदर्शन कर भारतीय टीम में जगह बनाई। कामनवेल्थ चैंपियनशिप में उन्हें जीत नहीं मिली, लेकिन उन्होंने अभ्यास जारी रखा और एशियन गेम्स के लिए अपनी तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ी।
एशियन गेम्स के फाइनल में चीनी ताइपे की चेन निएन-चेन के खिलाफ मुकाबले को लेकर परवीन ने बताया कि प्रतिद्वंद्वी विश्व और ओलिंपिक स्तर की नंबर वन खिलाड़ी रही है, ऐसे में उन्हें हराना आसान नहीं था। हालांकि वह रिंग में अपना शत प्रतिशत देने की सोच के साथ उतरी थी। इसी आत्मविश्वास के साथ उन्होंने मुकाबला लड़ा और 3-2 से जीत हासिल कर स्वर्ण पदक देश के नाम किया।
