रोहतक [अरुण शर्मा]। जिंदगी की जंग जीतने के लिए साहस, उत्साह और संकल्प होना चाहिए। हाथ हो न हो। इसकी बेमिसाल मिसाल हैं महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय में महिला छात्रवास की वार्डन डॉ. सुनीता मल्हान, जिनकी श्री राम पर लिखी किताब का मदवि के 16वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी ने विमोचन किया। उन्होंने 102 पेज की यह पुस्तक पैरों से लिखी है।

सन् 1987 की उस घटना को याद करते हुए डॉ. मल्हान गंभीर हो जाती हैं। बताती हैं कि तब वह एमए की छात्रा थीं। शादी हो चुकी थी। ट्रेन पर चढ़ते समय पैर फिसल गया और दोनों हाथ कट गए। उनके पति अस्पताल में ही छोड़कर चले गए और फिर नहीं लौटे। जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर और पति का छोड़कर चला जाना। उन्हें बड़ा झटका तो लगा लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हौसला नहीं खोया और एमए फाइनल करने की ठान ली।

इसी बीच मदवि की ओर से नौकरी का ऑफर आया। उन्होंने नौकरी ज्वाइन करने के साथ-साथ पढ़ाई जारी रखी। अपनी जिंदगी में आई विपरीत परिस्थितियों को हराकर उन्होंने खुद को साबित करके दिखाया। सफलता की वो कहानी बनीं की दूसरों का आज प्रेरणा दे रहीं है।

दो बार राष्ट्रपति से सम्मानित

2009 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी और 2010 में रानी लक्ष्मीबाई स्त्री शक्ति पुरस्कार राष्ट्रपति के हाथों से मिला। वे एथलीट भी हैं और पैरालंपिक खेलों में जलवा दिखा चुकी हैं। उन्हें 2011 में राज्य का सर्वोच्च खेल सम्मान भीम अवार्ड भी मिल चुका है।

श्रीराम पर कर चळ्कीं हैं शोध

1991 में एमफिल करने वाली डॉ. मल्हान ने श्रीराम पर लघु शोध किया था। उसी के आधार पर और विशेषज्ञों के सुझावों पर श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम बताते हुए वाल्मीकि रामायण के आधार पर 'श्रीराम-एक विवेचन' नामक इस पुस्तक को पैरों से लिखा।

जिंदगी का दर्दनाक दौर और पति छोड़कर चला गया

डॉ.सुनीता 1987 की उस घटना को याद करते हुए बताती हैं कि ट्रेन पर चढ़ते समय उनका पैर फिसल गया और दोनों हाथ कट गए। पति अस्पताल में ही उन्हें छोड़कर चले गए और फिर वापस नहीं लौटे। बड़ा झटका तो लगा लेकिन उन्होंने हौसला नहीं खोया और एमए फाइनल करने की ठान ली। इसी बीच मदवि में नौकरी लग गई। साथ-साथ उन्होंने पढ़ाई भी जारी रखी। एमफिल और पीएचडी तक शिक्षा ग्रहण की।

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Posted By: Kamlesh Bhatt