23 महीने वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन पर रहा बच्चा, रोहतक PGIMS में मौत से जंग जीतकर घर लौटा दक्ष
रोहतक पीजीआईएमएस में 23 महीने तक वेंटिलेटर और 100% ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने के बाद 8 वर्षीय दक्ष दिमागी बुखार से ठीक होकर घर लौट आया है।
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23 महीने वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन पर रहा बच्चा। फोटो जागरण
HighLights
23 महीने वेंटिलेटर पर रहने के बाद बच्चा ठीक हुआ।
पीजीआईएमएस रोहतक में दिमागी बुखार का सफल इलाज।
डॉ. कुंदन मित्तल और टीम की अथक मेहनत रंग लाई।
जागरण संवाददाता, रोहतक। छह साल की उम्र में जब आठ साल का यह बच्चा दक्ष 5 अक्टूबर 2024 को पीजीआइएमएस के पीआइसीयू यानि पीकू में पहुंचा था, तब वह बेहोशी की हालत में था। तेज दिमागी बुखार था और हाथ-पैर तक नहीं हिला पा रहा था, बीच-बीच में दौरे पड़ते थे। हालत इतनी गंभीर थी कि जिंदगी बचाने के लिए उसे लगातार वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत आक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ी।
करीब 23 महीने तक इसी स्थिति में रहने के बाद अब वही बच्चा अपने शरीर को हिला-डुला रहा है और सोमवार को पीकू से अपने घर रवाना हुआ। करीब दो साल तक चले इलाज में पीआइसीयू प्रभारी डा. कुंदन मित्तल और उनकी टीम ने बच्चे की लगातार निगरानी की।
दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी सहयोग को उपचार का हिस्सा बनाया गया। सोमवार को बच्चे के डिस्चार्ज के समय पूरा पीआइसीयू भावुक हो गया। चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के लिए यह केवल एक मरीज की छुट्टी नहीं, बल्कि करीब दो साल की मेहनत के बाद मिली बड़ी सफलता का पल था।
कुलपति डा. एचके अग्रवाल भी बच्चे के डिस्चार्ज के समय पीआइसीयू पहुंचे और चिकित्सकों व स्टाफ का हौसला बढ़ाया। उन्होंने कहा कि गंभीर मरीज को स्वस्थ होकर घर जाते देखना चिकित्सक के लिए सबसे बड़ी संतुष्टि है। उन्होंने डा. कुंदन मित्तल और उनकी टीम के निरंतर प्रयासों के साथ बच्चे के माता-पिता के दो साल तक अस्पताल में डटे रहने के जज्बे की सराहना की।
बच्चे के पिता सोमबीर दहिया गांव गढ़ी सिसाना के रहने वाले हैं और दिल्ली में टैक्सी चलाते हैं। परिवार में वह अकेले कमाने वाले हैं। बेटे दक्ष की बीमारी के बाद उन्हें अपना काम छोड़कर करीब दो साल पीजीआइएमएस में रहना पड़ा। उनकी पत्नी गृहिणी हैं और वह भी लगातार बेटे के सिरहाने बैठी रहीं। सोमबीर ने कहा कि पीजीआइएमएस पिछले दो साल से उनके लिए दूसरा घर बन गया था।
उन्होंने कहा कि सरकारी अस्पताल में मरीज की इतनी अच्छी देखरेख उन्होंने पहले कभी नहीं देखी। उनका कहना था कि यदि बच्चा निजी अस्पताल में होता तो शायद परिवार की सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती। उन्होंने डा. कुंदन मित्तल और पूरी टीम को भगवान से कम नहीं बताया।
डा. कुंदन मित्तल ने बताया कि बच्चे के पिता अकेले कमाने वाले थे और बेटे के इलाज के कारण काम नहीं कर पा रहे थे। ऐसे में टीम ने परिवार की आर्थिक मदद करने का भी प्रयास किया। उन्होंने कहा कि बच्चे की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया और अब वह स्थिर है। माता-पिता घर पर उसकी देखभाल कर सकते हैं। आगे फालोअप के दौरान उसकी स्थिति पर नजर रखी जाएगी।
जन्मदिन तक मनाया, पीआइसीयू से बन गया था रिश्ता
करीब दो साल तक पीआइसीयू में रहने के कारण बच्चा चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के लिए परिवार के सदस्य जैसा बन गया था। नर्सिंग स्टाफ ने बताया कि परिवार की खुशी के मौकों पर वे घर से खाना लाकर बच्चे के परिजनों के साथ साझा करते थे। बच्चे का जन्मदिन भी पूरा वार्ड मिलकर मनाता था।
सोमवार को जब बच्चा ठीक होकर घर के लिए निकला तो स्टाफ की आंखों में खुशी के आंसू थे। बच्चे के पिता ने चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ के पैर छूकर आभार जताया। केक काटा, मिठाई बांटी और स्टाफ को स्मृति चिह्न भेंट किए। करीब दो साल बाद पीआइसीयू से बाहर निकलते बच्चे को देखकर परिजनों और स्टाफ के लिए यह पल भावुक करने वाला रहा।
