ओपी वशिष्ठ, रोहतक

सिगरेट के एक कश में 200 हानिकारक केमिकल होते हैं, जिनमें से 40 ऐसे हैं, जो कैंसर का कारण बनते हैं। लेकिन इसके बावजूद लोग धूम्रपान करने से बाज नहीं ा रहे। धूम्रपान करना वाला इंसान खुद की जिदगी से तो खिलवाड़ करते ही हैं, अपने आसपास के लोगों के जीवन को भी खतरे में डालने का काम करते हैं। दुनिया में धूम्रपान करने वाले लोगों की भरमार है। लेकिन इसमें भारत के लोग भी पीछे नहीं है। एक शोध के मुताबिक भारत में 48 फीसद पुरुष तथा 20 फीसद महिलाएं धूम्रपान करती हैं। देश में कैंसर के 80 फीसद केस धूम्रमान से ही सामने आ रहे हैं। पंडित भगवत दयाल शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइस के कैंसर विभाग के विभागाध्यक्ष डा. अशोक चौहान ने बताया कि एक शोध के मुताबिक फेफड़ों के कैंसर से हर साल लगभग दस लाख लोगों की मौत होती हैं, जिनमें करीब 80 फीसद लोगों के कैंसर की वजह सिर्फ धूम्रपान है। उन्होंने बताया कि धूम्रपान स्लो पाइजन की तरह कार्य करता है। शुरूआती प्रभाव के रूप में स्वास्थ्य समस्याएं जैसे गले में जलन, सांस लेने में परेशानी और खांसी आदि से इसके परिणाम दिखने शुरू होते हैं. इसके बाद धीरे-धीरे ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, हृदय रोग, स्ट्रोक और विभिन्न प्रकार के कैंसर होने की संभावना होती है। धूम्रपान इंसान को अकाल मृत्यु की तरफ ले जाता है। उन्होंने बताया कि सिगरेट के एक कश में 200 हानिकारक केमिकल होते हैं, जिनमें से करीब 40 ऐसे हैं, जो कैंसर का कारण बनते हैं। पुरुष व महिलाओं की औसत आयु हो जाती है कम

डा. चौहान के मुताबिक धूम्रपान करने वालों में पुरुष ही नहीं महिलाएं भी शामिल हैं। एक शोध के मुताबिक धुम्रपान करने से एक पुरुष की औसतन आयु करीब 13 वर्ष तथा एक महिला की औसत आयु करीब 14 वर्ष कम हो जाती है। पीजीआइ में कैंसर के अगर 100 मरीज इलाज के लिए आते हैं, तो उनमें से करीब 80 ऐसे हैं, जिनको धूम्रपान से कैंसर हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ अब शहरों में भी हुक्का बार का नया विकल्प आया है, जिसमें युवा वर्ग धूम्रपान की तरह बढ़ रहे ं। फलेवर्ड हुक्का स्वास्थ्य के लिए ज्यादा हानिकारण है। ग्रामीण क्षेत्रों में हुक्के का प्रचलन ज्यादा रहता है।

वर्जन

धूम्रपान कैंसर का सबसे बड़ा कारण है। पीजीआइ में अगर 100 मरीज कैंसर के आते हैं, उनमें से करीब 80 को कैंसर का कारण धूम्रपान पाया जाता है। इससे छुटकारा पाने के लिए इच्छा शक्ति की जरूरत है। संस्थान द्वारा समय-समय पर काउंसलिग भी की जाती है और जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। डा. अशोक चौहान, विभागाध्यक्ष कैंसर विभाग, पीजीआइएमएस, रोहतक

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