अमित सैनी, रेवाड़ी

जीवन के किसी भी क्षण में वैराग्य उमड़ सकता है, संसार में रहकर भी प्राणी संसार को तज सकता है। करीब बीस वर्ष पूर्व मामा जैन धर्म अपनाकर संत बन गए थे और अब उन्होंने अपनी ही सगी भांजी को साध्वी के तौर पर दीक्षा दी। इस भावनात्मक दृश्य को जिसने भी देखा उसका हृदय करुणा और नेत्र आंसुओं से भर गए। गांव गोकलगढ़ में बने जैन स्थानक एसएस जैन सभा के परिसर में रविवार को वैश्य समाज की आर्या पौदार ने जैन साध्वी के तौर पर दीक्षा ग्रहण की। सगे मामा शिवेंद्र मुनि महाराज ने दीक्षा देने के साथ ही अपनी भांजी का नया नामकरण भी किया। आर्या अब साध्वी आर्या जी महाराज बन गई हैं। महज 18 वर्ष की उम्र में जागी वैराग्य की भावना बिहार के जिला मधेपुरा के प्रखंड आलमनगर निवासी रामजी पौदार और लीला देवी के सात संतान है। पांच बेटियों में तीसरे नंबर की आर्या ने मैट्रिक तक की पढ़ाई की है तथा आरंभ से ही उनकी आध्यात्म के प्रति आस्था थी। बीस वर्ष पूर्व आर्या के मामा शिवेंद्र मुनि ने जैन धर्म के प्रति आस्था जताते हुए दीक्षा ली थी। आर्या तपयोगी मुनि बन चुके अपने मामा के प्रवचनों से पूरी तरह प्रभावित थीं और उन्होंने जैन धर्म के शास्त्रों का अध्ययन भी छोटी उम्र से ही करना शुरू कर दिया था। बहुत सी धार्मिक पुस्तकें उनको कंठस्थ हैं। हाल ही में 18 वर्ष की हुई आर्या ने अपने स्वजन के समक्ष इच्छा जाहिर की कि वह जैन साध्वी बनना चाहती है। आर्या की इच्छा का सम्मान करते हुए स्वजन ने उसे अनुमति दे दी। आर्या ने अपने मामा शिवेंद्र मुनि से ही दीक्षा ली। दीक्षा के समय साध्वी आर्या जी महाराज ने जन्म के अपने माता-पिता व परिवार का त्याग कर दिया। दिल्ली के पंजाबी बाग निवासी विजय बंसल व सुशीला बंसल उनके धर्म के माता पिता बने। नगर पार्षद राजेंद्र सिघल, समाजसेवी रिपुदमन गुप्ता, विनयशील गोयल, जैन सभा के प्रधान अरुण गुप्ता, लक्ष्मीनारायण व अन्य मौजिज लोगों ने शिवेंद्र मुनि के आग्रह पर साध्वी बनाने का अनुमोदन किया। साध्वी आर्या जी महाराज ने साध्वी एषणा जी महाराज को अपने गुरु के तौर पर शिखा दान की। दीक्षा का मतलब ऐसी जिदगी सिर्फ उबला पानी पीना, नंगे पांव रहना, लाइट, पंखा, एसी, मोबाइल का इस्तेमाल नहीं, सारी इच्छाओं का त्याग, सिर्फ गुरु का अनुसरण करना, घरों में जाकर खाना मांगना, खुद नहीं पका सकते, हर छह महीने में सिर मुंडवाते रहना, सफेद पोशाक पहनना, जमीन पर सोना, रात्रि भोजन का त्याग, घर से भी त्याग।

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