जागरण संवाददाता, रेवाड़ी :

प्रयास करें तो हर मुश्किल आसान हो सकती है। तालाबों को बचाने के लिए जहां कहीं भी प्रयास हुए वहां इनको बचा भी लिया गया। जिला में ही कई ऐसे गांव हैं जहां तालाबों तक नहरी पानी पहुंच रहा है जिसने उन्हें ¨जदा रखा हुआ है। ग्राम पंचायतों को आगे आने की जरूरत

जिलेभर में 700 से अधिक तालाब हैं लेकिन एक चौथाई की भी देखरेख ठीक तरीके से नहीं हो रही है। जिन गांवों में पेयजल सप्लाई पहुंच गई वहां तालाबों को दरकिनार किया जाने लगा है। आलम यह हो गया है कि कई गांवों में तालाबों की तरफ सालों से ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है। तालाबों को जीवित रखना है तो सिर्फ जिला प्रशासन पर निर्भरता से बात बनने वाली नहीं है। ग्राम पंचायतों को खुद भी इसके लिए आगे आना होगा। इस दिशा में गांव मस्तापुर का तालाब एक बेहतर उदाहरण है। मस्तापुर के तालाब की चारदीवारी से लेकर इसमें पानी भरने तक की व्यवस्था को लेकर वहां की पंचायत गंभीरता से प्रयास कर रही है। ग्राम पंचायत के प्रयासों का ही नतीजा है जो इस तालाब में हर माह नहर का साफ पानी आता है। तालाब पानी से लबालब भरा हुआ है तथा सारे गांव के पशुओं के लिए इसी तालाब का पानी काम आता है। तालाब के पानी से भरे रहने का प्रभाव यह है कि गांव का जलस्तर भी काफी बेहतर स्थिति में हैं।

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गांव के तालाब में हर महीने पानी आता है। ग्राम पंचायत लगातार इस मामले में ¨सचाई विभाग के संपर्क में रहती है। तालाब में पानी भरा रहने से गांव के सिर्फ भूजल स्तर पर प्रभाव नहीं पड़ा है बल्कि पशुओं को लेकर आने वाली समस्याएं हमारे गांव में नहीं है। ग्राम पंचायतों को खुद भी इस दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।

-सतबीर ¨सह, सरपंच मस्तापुर

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गांव के तालाब में पानी रहता है तो हम अपने पशुओं के पीने व नहाने के पानी की ¨चता नहीं होती। ग्रामीणों को भरे हुए तालाब से और भी कई लाभ है। सप्लाई का पानी तो बस इतना ही आता है कि हम अपने घर की जरूरतें ही पूरी कर पाते हैं।

-रामलखन यादव

Posted By: Jagran

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