अश्वनी तिवारी, रेवाड़ी

शादी के पवित्र बंधन में बंध कर सात जन्मों का साथ निभाने का वादा अब साकार होता नहीं दिख रहा है। दाम्पत्य जीवन बिखर रहा है। शादी को सालभर भी नहीं होता कि दहेज प्रताड़ना की शिकायत से लेकर तलाक तक के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा रहा है। जिला कोर्ट की ही बात की जाए, तो इस साल जनवरी से लेकर अब तक तलाक के लिए 525 मामले न्यायालय के समक्ष आ चुके हैं। यह बैचेन करने वाली स्थिति है, क्योंकि सामाजिक ताना-बाना तेजी से बिगड़ता जा रहा है। घर के मामूली झगड़ों का फैसला अब पंचायत व सामाजिक लोग नहीं बल्कि कोर्ट कर रहा है। यह कहीं न कहीं सहनशीलता की कमी के चलते हो रहा है। आइए जानते हैं, दो ऐसे मामले जिनमें बात भले ही मामूली थी लेकिन मामला कोर्ट तक जा पहुंचा और नौबत तलाक तक की आ गई।

केस 1: मोबाइल पर बात करना ही गुजरा नागवार

पत्नी मोबाइल पर अपने घर लगातार बातें करती थी। पति व ससुरालपक्ष के लोगों ने कई बार समझाया कि ज्यादा बातें न करें, लेकिन बात नहीं बनी। मोबाइल पर बात करना बंद नहीं हुआ तो घर में भी तनाव बढ़ता चला गया। आलम यह हुआ कि पत्नी और पति दोनों ने ही कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर दी। मामला आज भी कोर्ट में ही विचाराधीन है जिसमें तलाक के लिए कई और आधार भी शामिल किए गए हैं।

केस 2: पत्नी ने कहा, मुझ पर भूत प्रेत का साया

शहर की ही रहने वाली एक महिला ने अपने पति पर पहले दहेज प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया और बाद में तलाक के लिए कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया गया। पत्नी ने कहा उस पर भूत प्रेत का साया है और वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती। लाख समझाने पर भी दोनों साथ नहीं गए और अब अलग-अलग ही रह रहे हैं।

केस 3: जब शादी के 15 साल बाद मांगा तलाक

वैवाहिक बंधन में दरार शादी के 15 सालों बाद भी आ रही है। जिले के ही एक गांव की रहने वाली महिला ने शादी के 15 साल के बाद अपने पति से तलाक मांग लिया। श्किायत थी कि पति अधिक शराब पीने लगा है। हालांकि कोर्ट की लंबी तारीखों और मध्यस्थता करने के बाद दंपति साथ रहने के लिए राजी हुए।

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आपसी सहमति से ही मांगने लगे तलाक

घरेलू ¨हसा, दहेज प्रताड़ना व अन्य आधार को लेकर तलाक मांगने के मामलों के साथ ही आपसी सहमति से भी तलाक लेने के लिए बड़ी तादाद में दंपति कोर्ट में पहुंच रहे हैं। ¨हदू विवाह अधिनियम की धारा 13 बी के तहत आपसी सहमति से संबंध विच्छेद के लिए आवेदन किया जाता है। इन मामलों में छह माह का समय पक्षकारों को पुनर्विचार के लिए दिया जाता है। तलाक की 525 याचिकाओं में से 367 मामले 13बी के तहत ही दायर किए गए हैं।

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हर साल आ रहे 300 से अधिक मामले:

जिला न्यायालय में तलाक के लिए हर साल 300 से अधिक याचिकाएं दायर हो रही है। वर्ष 2015 में जहां 365 याचिकाएं तलाक के लिए दायर की गई थी वहीं वर्ष 2016 में 367 याचिकाएं दायर हुई। इस साल तमाम पिछले रिकार्ड टूटे हैं तथा 525 याचिकाएं दायर हुई है।

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मुख्य बात सहनशीलता की है। दंपति मामूली बातों पर ही उलझ जाते हैं तथा इसे अहम का विषय बना लेते हैं। आपसी कड़वाहट बढ़ती है और मामला कोर्ट तक पहुंच जाता है। तलाक के लिए आने वाले मामलों में हमारा प्रयास घर बसाने का होता है तथा दोनों को समझाया भी जाता है। बहुत से मामले जहां समझाने से सुलझ जाते हैं वहीं जो मामले सुलझ नहीं पाते उनका फैसला कोर्ट में ही होता है।

-राजीव अग्रवाल, ट्रेंड मीडियेटर, जिला कोर्ट।

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आपसी तनाव के कई कारण होते हैं। महिला का उत्पीड़न हो रहा है या फिर पति शराब पीकर घर आता है तो विवाद पनपता है। इनके अतिरिक्त पति-पत्नी का मिसमैच यानि लड़की ज्यादा पढ़ी लिखी या फिर लड़का ज्यादा सुंदर हो के अलावा शादी से पूर्व के संबंध आदि मुख्य कारण होते हैं, जिनके चलते दाम्पत्य जीवन में दरार आती है। आवश्यकता है कि पति और पत्नी दोनों वैवाहिक बंधन का महत्व समझे। परिपूर्णता कभी नहीं हो सकती, इसलिए कुछ पहलुओं पर किया गया समझौता दाम्पत्य की गाड़ी को चला सकता है।

-सरिता शर्मा, संरक्षण एवं बाल विवाह निषेध अधिकारी।

Posted By: Jagran

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