सरकार का आदेश हो तो कुछ नौकरशाहों की तानाशाही पलक झपकते चौगुनी हो जाती है । सिर्फ इशारा ही तो चाहिए। .और फिर प्रधानमंत्री मोदी का नाम आगे लगा हो तो ऐसे ही मुहर लग जाती है। जो चाहो, जैसे चाहो, वैसे धक्केशाही कर लो। रन फॉर यूनिटी के लिए जिस तरीके से कुछ नौकरशाहों ने स्कूल-कॉलेजों के प्रतिनिधियों को धमकाया, उससे साफ हो गया कि कुर्सियों पर काबिज ऐसे लोग बुद्धिजीवियों-शिक्षाविदों को जब और जैसे चाहेंगे, वैसे टांग सकते हैं। सीधे शब्दों में कहा,  आयोजन में 500 लोगों की भागीदारी कराओ नहीं तो 500 लोगों का रिफ्रेशमेंट की व्यवस्था करा दो। नहीं किया तो किस तरह निकला जाता है, वह निकालना आता है।

बिगड़े बोल सुन मौके पर मौजूद शिक्षाविद देखते रह गए और समाजसेवी बगले झांकने लगे। यह रन फॉर यूनिटी के लिए जोश था। जोगिया के लिए यह जांच का विषय हो सकता है कि सरकार की तरफ से आयोजन के लिए कितनी धनराशि आई और शहरियों से कितनी.किसने वसूली की। दूसरी तरफ पूरा शहर स्मॉग से भरा पड़ा था। डॉक्टर सुबह सबेरे टहलने से मना कर रहे हैं और यहां साहब लोग दौड़ने-दौड़ाने के लिए चाबुक हांक रहे थे। प्रदूषण का स्तर अति खतरनाक से भी ऊपर है। जवाबदेह कौन है, कोई बताने वाला नहीं। सरकारी विभागों के नाम गिनने की शुरुआत की जाए तो अंत नहीं हो। दीपावली गिफ्ट के कारण मुंह बंद। देर रात तक पटाखों की आवाज से जिम्मेदारों के कान बंद है। उद्योगों के धुएं से आंख बंद है। हवा पानी सब प्रदूषित। पुलिस और तहसील वाले ऐसे ही बदनाम हैं। धुआं छोड़ती गाड़ियों को देखने वाले आरटीए की कोई भूमिका नहीं। पराली जलने का कोई जिम्मेदार नहीं। नहरों  व नालों में गंदा पानी डालने वाले टैंकर फर्जी हैं। शहर हांफ रहा है। प्रदूषण में साहबों ने जोगिया को जगाया,  प्रदूषण भी फर्जी है। आओ दौड़ लगाएं। खुद हारने वालों के सहारे सब कुछ छोड़ जीत की नांव लेकर निकल पड़े नेताजी

जोगिया ने एक बड़ी जीत का दावा करने वाले नेताजी के कम मार्जन का कारण जाना। शहर में कई तरह की चर्चाएं चलती मिली। पहली बड़ी बात नेताजी ने अपना सारा चुनाव खुद के चुनाव हारने वालों के सहारे छोड़ दिया। वे मुख्य भूमिका में आकर बाकी सबको नजरअंदाज करते चले गए। कई खास भी नेताजी की नजरों में कमजोर कर दिए। नेताजी को उनके सिवाय कोई दूसरा नजर नहीं आया। उन्हें खास पर भी शक होने लगा। 24 को ईवीएम नतीजे आने शुरू हुए तो नेताजी के सामने भी असलियत आती चली गई। खास बताने वाले अब सब कुछ छोड़कर अपने काम धंधे में लग गए और काम करने के बाद भी शक करने पर दूसरे भी पीछे हट गए। हाथ वालों का भी दर्द कम नहीं साहब

जोगिया हाथ वालों के एक कार्यक्रम में रविवार को चला गया। अंदर कमरा खचाखच भरा हुआ था। जोगिया बैठक का विषय जानने के बाद बाहर आ गया। जोगिया गाड़ियों के बीच में खड़े कार्यकर्ताओं के बीच पहुंच गया। शहर के चुनाव पर चर्चा चली तो यहां भी भितरघात होने की बात उठी। एक बोला बड़ों का थोड़ा साथ मिल जाता तो हाथ कुछ कमाल कर जाता। दूसरा बोला भाई इसी पर तो दो भाइ आपस में लड़ने लगे थे। बात फिर ग्रामीण की उठी तो तीसरा बोला आज कुर्सी पर सबसे आगे बैठने वाले चुनाव में नहीं दिखाई दिए। उनके पांव तक पकड़े, लेकिन साथ नहीं दिया। पहले वाला बोला भाई अपनों ने ही घाव दिए हैं। नेताजी का अपना टेंट

फूल वाले बड़े नेता चुनाव में अपना या अपनों का टेंट लेकर निकले थे। कहीं पर भी सभा या रैली रखी जाती थी तो प्रत्याशी के सामने अपना टेंट लगाने की शर्त रख देते थे। नाम सुरक्षा, व्यवस्था और पार्टी के रंग का देते थे। प्रत्याशी को केवल चेक देना होता था। अब बेचारा प्रत्याशी क्या करता? उनकी सब बातों को मानना पड़ा। टेंट के चक्कर में तो इस बार एक प्रत्याशी के क्षेत्र में तो एक भी बड़े नेता ने रैली नहीं की। उसने टेंट की शर्त मानी तो भितरघात ने कार्यक्रम टाल दिया। वह तो उनके प्रयास थे कि जीत गए। नहीं तो अपनों ने घर बैठाने की कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अपने अब भी जड़ काटने में लगे हैं। बत्ती और गाड़ी में रोड़ा डाल रहे हैं। प्रस्तुति : अरविन्द झा- जगमहेंद्र सरोहा (यह कॉलम पूरी तरह से गपशप पर आधारित है।)

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