रामकुमार कौशिक, पानीपत

नाम साजिदा। उम्र 45 साल। बचपन में मां ने साथ छोड़ा। पांच वर्ष में ही पिता का सहारा बनी। 16 साल पहले शादी हुई। तीन माह बाद ही पति को करंट लगा। इसमें सलीम का एक हाथ कट गया। पहाड़ जैसी मुश्किलें आई। साजिदा ने हार नहीं मानी। बल्कि नारी सशक्तीकरण की मिसाल बनी। आज साजिदा दिव्यांग पति की बैसाखी बन जिंदगी की गाड़ी खींच रही है।

यहां बात हो रही है बिहार के कटिहार जिले के गांव चापाखोर की रहने वाली साजिदा की। उसकी 16 वर्ष पहले उसकी शादी सलीम के साथ हुई थी। तीन महीने ही हुए थे कि करंट लगने पर वो झुलस गए। नौबत यहां तक आई कि हाथ तक काटना पड़ा। साल भर बाद हाथ का जख्म ठीक हुआ तो पानीपत आ गए। घर का खर्च चलाने के लिए सलीम दिहाड़ी करने लगे। कभी काम मिलता तो कभी खाली रह जाते। बच्चों का पालन पोषण भी मुश्किल हो रहा था। साजिदा ने भी सब्जी बेचनी शुरू की। इससे भी हालात नहीं सुधरे तो वर्षभर पहले साजिदा ने ई रिक्शा का स्टेयिरंग थाम लिया। कई माह तक 300 रुपये रोज किराये पर रिक्शा लेकर चलाती रही। कुछ माह बाद इसी रिक्शा को 46 हजार में खरीदा। अब सलीम और साजिदा के घर की गाड़ी चलने लगी है। अब दोनों बच्चों को शिक्षा भी दिला रही है। साजिदा मानती हैं कि संघर्ष से हार मानने की वजह लड़ा जाए तो सब कुछ संभव है। हार नहीं मानी तो आज कुछ कर पा रही हूं। हाल में वो मॉडल टाउन में एक किराये के कमरे में रह रही हैं। इसके अलावा दोनों बच्च कभी चुनौतियों से हार नहीं मानी

साजिदा के मुताबिक उसने ई रिक्शा का स्टेयरिग थामा तो कई चुनौतियां उसके सामने आई। पहले तो उसे रिक्शा चलाना सीखा। पूरे शहर की जानकारी हासिल की। कई बार गलत सवारी से भी सामना हुआ। लेकिन उसने हार नहीं मानी और चुनौतियों को पार पाया। आज वो फट से जगह का नाम लेती है सवारी को लेकर वहां पहुंच जाती है। बचपन में पिता का सहारा बनी

साजिदा आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर है। पांच साल बाद मां उलेदा की मौत हो गई। पिता इनामुल ने दूसरी शादी कर ली। दादी ने बढ़ा किया, लेकिन परिवार के सामने खड़ी गरीबी ने भूखों मरने की कगार पर पहुंचा दिया। ऐसे में स्कूल जाने की उम्र में वो दोनों बहनें पिता के साथ खेत में दिहाड़ी पर जाने लगी और परिवार का गुजारा चल सका। इसके बाद उनकी शादी कर दी गई।

Posted By: Jagran

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