पानीपत, जागरण संवाददाता : 18 दिसंबर। आज ही के दिन पानीपत में जन्मे अरुण मिगलानी। यही अरुण मिगलानी अब महंत अरुण दास महाराज के नाम से जाने जाते हैं। उनके जन्मदिवस पर फेसबुक से लेकर वाट्सएप पर शुभकामनाएं देने की झड़ी लगी है। हरिद्वार में इनका वास है। श्री जगन्नाथ धाम की गद्दी संभालते हैं। पानीपत से कोई हरिद्वार जाता है तो इनके आश्रम में जरूर पहुंचता है।

आइबी कालेज से ग्रेजुएट बाबा जी से आशीर्वाद लेने के लिए सभी सियासी दलों के नेता आतुर रहते हैं। सामाजिक संगठन के प्रतिनिधि भी पीछे नहीं। बाबा जी की एक खास बात है, जो कहते हैं, स्पष्ट कहते हैं। आसाराम पर बरस चुके हैं। इन्हें संत नहीं मानते। कहते हैं, आसाराम ने संतों को बदनाम कर दिया। जागरण में पढ़िए अरुण मिगलानी यानी अरुण दास महाराज की कहानी।

पानीपत के प्रेम मंदिर के पास अरुण मिगलानी का घर है। घर में धार्मिक वातावरण था। अरुण मिगलानी वर्ष 1992 में पहली बार हंसदेवाचार्य से मिले। पहले ही साक्षात्कार में इन्होंने हंसदेवाचार्य को अपना गुरु मान लिया। लेकिन हंसदेवाचार्य ने इन्हें अपना शिष्य नहीं बनाया।

कहा कि पहले पक्का हो लो। माता-पिता की सेवा करो। तभी मेरे पास आना। इन्होंने आदेश को माना। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए, सभी कर्तव्य निभाने के बाद पहुंच गए अपने गुरुदेव के पास। यह भी दिलचस्प है कि स्वामी हंसदेवाचार्य ने इन्हें ही अपना पहला शिष्य बनाया। इन्हें गद्दी का वारिस भी घोषित किया। स्वामी के निधन के बाद गद्दी को लेकर कुछ विवाद भी हुआ। लेकिन अरुण मिगलानी अंतत: महंत अरुण दास महाराज बन गए। जगन्नाथ धाम अब इनका स्थायी निवास हो गया है।

2006 में दीक्षा ली

अरुण महाराज ने वर्ष 2006 में दीक्षा ली थी। अरुण महाराज ने एक इंटरव्यू में बताया कि स्वामी हंसदेवाचार्य ने कह दिया था कि अरुण ही गद्दी पर बैठेंगे। स्वामीजी जहां जाते, उन्हें साथ ले जाते थे। स्वामी जी ने काफी कुछ सिखाया। आध्यात्म क्या है, ये बताया। उसी शिक्षा का वह आगे प्रसार कर रहे हैं। जब माता-पिता उन्हें कह रहे थे कि संत नहीं बन ना, तब स्वामी जी ने कहा था कि अरुण को मुझे समर्पित कर दो।

अच्छा होता कि आसाराम गृहस्थी संभालते

एक इंटरव्यू में अरुण दास महाराज ने कहा कि आसाराम को गृहस्थी में रहना चाहिए था। गुरु वो होता है जो शिष्यों की रक्षा करता है। लोभी गुरु, लालची चेला। यह नहीं होना चाहिए। अगर गुरु ही शिष्य का धन हरता है तो वो नरक का भोगी होता है।

कहां-कहां से आते हैं भक्त

हरिद्वार में श्री जगन्नाथ धाम है। स्वामी जगन्नाथ ने ही इस आश्रम की नींव रखी थी। वह देशभर में जाते थे। सो, देशभर में उनके भक्त है। इसके बाद स्वामी हंसदेवाचार्य ने गद्दी संभाली। मुख्य तौर पर पानीपत, सोनीपत, झज्जर, बहादुरगढ़, फरीदाबाद, मुजफ्फरनगर, मेरठ, गुजरात के सूरत और अहमदाबाद से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

क्या आप जानते हैं, स्वामी रामदेव को लाए थे पानीपत

क्या आप जानते हैँ कि योग गुरु स्वामी रामदेव को पानीपत में स्वामी हंसदेवाचार्य लाए थे। पानीपत में योग गुरु बाबा रामदेव का पहला शिविर लगा था। यह शिविर स्वामी जगन्नाथ गुरु की याद में लगाया गया था। उसके बाद से बाबा रामदेव भी प्रसिद्ध होते चले गए।

अब दोस्त चरण स्पर्श करते हैं

महंत अरुण दास कहते हैं, अब दोस्त उन्हें चरण स्पर्श करते हैं। वैसे वह सभी जीवों में भगवान का दर्शन करते हैं। इसलिए जब पुराने दोस्त जब हाथ जोड़ते हैं तो वह भी उन्हें प्रणाम करते हैं। हां, थोड़ा बदलाव जरूर हुआ है।

कोरोना मुक्ति के लिए 108 दिन का व्रत रखा

महंत अरुण दास ने बताया कि कोरोना मुक्ति के लिए उन्होंने 108 दिन का व्रत रखा था। वह भगवान हनुमान के परम भक्त हैं। जब-जब हनुमान स्वरूप निकलते हैं, वह पानीपत जरूर आते हैं।

दोनों दलों में इनके भक्त

कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों ही दलों में इनके भक्त हैं। बुल्ले शाह हों या फिर प्रमोद विज। इनके समर्थक तक इनसे आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। फेसबुक इन्हीं समर्थकों द्वारा प्रेषित शुभकामनाओं से भरा है। दैनिक जागरण ने जब इन्हें फोन किया तो भी महंत के पास शुभकामनाएं देने वाले लोग मौजूद थे। संतों का जमावड़ा था। पानीपत से भी कुछ लोग उन्हें बधाई देने रवाना हो चुके हैं।

Edited By: Ravi Dhawan