पानीपत, [रामकुमार कौशिक]। सन् 1761 में मराठे सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में अहमदशाह अब्दाली से लडऩे के लिए घोड़ों पर सवार होकर पानीपत की धरती पर पहुंचे थे। लेकिन 259 वर्ष बाद उनके वंशज इसी युद्ध स्थली से मिट्टी लेकर साइकिल पर निकले। जिनके काफिले को बाजीराव मस्तानी के वंशज नवाब शादाब अली बहादुर ने झंडी दिखाकर रवाना किया। वो करीब 1400 किलोमीटर का सफर तय करके नौ दिन में नासिक पहुंचेंगे। रवाना होने से पूर्व उन्होंने न केवल छत्रपति शिवाजी और सदाशिव राव भाऊ के नारे लगाए, बल्कि युद्ध स्थली की मिट्टी से माथे पर तिलक किया।

दल में 27 से 74 साल के लोग शामिल

महाराष्ट्र के नासिक से मराठा वंशज के 36 सदस्यीय दल में 27 साल के युवा से लेकर 74 साल के बुजुर्ग शामिल हैं। दल का नेतृत्व कर रहे डॉ. आबा पाटिल ने कहा कि उनके सामने इतिहास को गलत पेश किया गया था। मराठी लेखक विश्वास पाटिल ने पानीपत की लड़ाई पर किताब लिखी तो उसी से उन्हें साल भर पहले असलियत का पता चला। इस पर 14 जनवरी को शौर्य दिवस पर युद्ध स्थली पानीपत आने का प्लान बनाया। पाटिल ने कहा कि 259 वर्ष पूर्व उनके पूर्वज युद्ध लडऩे के लिए घोड़ों पर सवार होकर यहां पहुंचे थे। जो भले ही हार गए, लेकिन उनके बलिदान पर हमें गर्व है। इसलिए हम साइकिल पर चलकर यहां से जीतकर जाएंगे।

युद्ध स्थली से लेकर गए मिट्टी 

डॉ. आबा पाटिल ने बताया कि वो नासिक के रामशेज किला से मिट्टी के साथ जल लेकर यहां आए हैं। अब युद्ध स्थली से भी मिट्टी लेकर जा रहे है। जिसे किले पर रख हर रोज माथे पर इसका तिलक लगा खुद को गौरवान्वित महसूस करेंगे। उन्होंने कहा कि हमें मराठा वंशज होने पर गर्व है। अब यहां आना जाना लगा रहेगा।

हर रोज करेंगे 150 किलोमीटर का सफर तय 

दल में शामिल सबसे बुजुर्ग 74 साल के काशी नाथ देसाई ने कहा कि माथे पर हार का कलंक लेकर जी रहे थे। लेकिन अब गौरव अपने साथ लेकर निकले हंै। उन्होंने बताया कि वो नौ दिन में 1400 किलोमीटर का सफर साइकिल से तय करके 22 जनवरी को नासिक पहुंचेंगे। हर रोज 150 किलोमीटर का सफर तय करेंगे। पूर्वजों के बलिदान को याद करके और युद्ध स्थली को देख मेरा हौसला भी युवाओं से कम नहीं रहा है। वहीं सबसे युवा 27 साल के सुदर्शन जाधव ने कहा कि युद्ध स्थली के बारे में सिर्फ पढ़ा था, अब आकर देख भी लिया। हमें अपने पूर्वजों के बलिदान को बेकार नहीं जाने देंगे।

 

Posted By: Anurag Shukla

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