यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 15, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
स्वच्छ सर्वेक्षण-2022 से पहले संवरेगे सार्वजनिक शौचालय, रख रखाव का कार्य होगा आउटसोर्स
यमुनानगर में स्वच्छ सर्वेक्षण-2022 के लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। कचरा प्रबंधन पर जोर दिया जा रहा है। ...और पढ़ें

यमुनानगर, जागरण संवाददाता। स्वच्छ सर्वेक्षण-2022 को लेकर नगर निगम पूरी तरह हरकत में है। एक ओर जहां कचरा प्रबंधन पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है वहीं दूसरी ओर से निगम एरिया में बने 270 सार्वजनिक व सामुदायिक शौचालयों की सफाई व रख-रखाव कार्य आउटसोर्स करने का निर्णय लिया है। इसके लिए टेंडर काल किया गया है। फिलहाल बदहाली झेल रहे इन शौचालयों की सफाई के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति व आवश्यक सामान्य की व्यवस्था एजेंसी को करनी होगी। प्रति सीट प्रति माह की दर से रेट मांग गए हैं। निगम अधिकारियों का स्वच्छ सर्वेक्षण से पहले तमाम शौचालयों को दुरुस्त किया जाएगा।
तीन वर्ष पहले बनवाए सार्वजनिक शौचालय देखरेख के अभाव में बदहाल हो चुके हैं। कहीं दरवाजे टूटे पड़े हैं तो कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है। नगर निगम ने 22 वार्डो में 270 शौचालय बनवाए थे। एक शौचालय पर 70 हजार रुपये खर्च आए थे। ऐसे शौचालयों की संख्या भी कम नहीं है जिनमें आज तक पानी के कनेक्शन नहीं दिए। जिन पर दिए गए हैं, वह भी खस्ता स्थिति में हैं। खासतौर पर नगर निगम में शामिल हुए गांवों में शौचालयों का बुरा हाल है।
हाउस की बैठकों में उठ चुका मामला
हाउस की बैठकों में भी यह मामला कई बार उठ चुका है, लेकिन अधिकारियों ने ध्यान नहीं दिया। वार्ड 13 से पार्षद निर्मल चौहान, वार्ड चार से देवेंद्र सिंह व पांच विनय कांबोज का कहना है कि निगम ने सार्वजनिक शौचालय तो बनवा दिए, लेकिन इनकी देखरेख की व्यवस्था करना मुनासिब नहीं समझा। शौचालयों पर कहीं दिनभर व्यर्थ पानी बहता है तो कहीं आज तक पानी नहीं पहुंचा। गांधी नगर में रखे शौचालयों में टोंटियां टूटी पड़ी पड़ी हैं। आज तक किसी ने सुध नहीं ली। सहारनपुर रोड, गांधीनगर, जिमखाना रोड, नेशनल हाइवे, मंडेबरी, वार्ड 12 व 13 सहित अन्य कई क्षेत्रों में ये शौचालय बंद पड़े हैं।
औद्योगिक क्षेत्र में बुरा हाल
नगर निगम की ओर से औद्योगिक क्षेत्र में दो वर्ष पहले सार्वजनिक शौचालय रखे गए। शुरुआती दौर में लोगों ने बेहतर तरीके से यूज किया। समय की करवट के साथ ये शौचालय बदहाल होने शुरू हो गए। क्षेत्र के लोगों ने अलग-अलग शौचालय पर अपना-अपना नाम लिख लिया। किसी पर महेश लिखा है, तो किसी पर नाजर। स्वयं यूज करने के बाद इन पर ताला लगा दिया जाता है। यह स्लम एरिया है। साथ ही आसपास दुकानें भी हैं। औद्योगिक इकाइयों में आने वाले ट्रक यहीं खड़े होते हैं। ऐसे में परेशानी और भी बढ़ जाती है।
सफाई की नहीं बनी ठोस योजना
शौचालयों की सफाई व रखरखाव को लेकर नगर निगम की ओर से ठोस योजना न बनाकर इसका जिम्मा उन लोगों को ही दे दिया जो प्रयोग करेंगे। उस दौरान इसके लिए बकायदा कमेटी का गठन किया किया गया। इसमें क्षेत्र के लोग ही शामिल किए गए। यह कमेटी ही इनकी सफाई और रखरखाव करती है, लेकिन यह काम बेहतरी से नहीं हो पा रहा है। व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। क्योंकि मौजूदा हालात ये हैं कि कहीं पानी की व्यवस्था नहीं है तो कहीं ताले लटके हुए हैं।
