जागरण संवाददाता, समालखा: नगरपालिका की अनदेखी से अधिकांश पात्रों को प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्त नसीब नहीं हो रही है। किसी के मकान टूटे तो किसी के अधूरे पड़े हैं। वे खुले आसमान के नीचे और किराए के मकान में रहने को मजबूर हैं। दफ्तर में कोई संतोषजनक जवाब नहीं देता। भरोसा देकर उल्टा भेज देता है। शौचालय टूटने से पात्र रेलवे की जमीन पर शौच करने जाते हैं। आसपास में सामुदायिक शौचालय भी नहीं है।

वार्ड-16 के अनिल पुत्र राजेंद्र ने बताया कि नपा से आदेश के बाद उसने करीब छह माह पहले मकान तोड़ा था। डीपीसी तक बनाई थी। आगे निर्माण के लिए पैसे नहीं थे तो किराए के कमरे में रहने लगे। खुले में शौच करने को मजबूर हो गए। सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद भी कोई किस्त नहीं मिली। वहीं सतीश की मां परमेश्वरी ने बताया कि सर्दी में मकान तोड़ने के बाद से प्लास्टिक शीट से छप्पर बनाकर रह रहे हैं। बारिश, धूप व तूफान में काफी परेशानी होती है।

शिव कुमार ने बताया कि मकान लेंटर तक पहुंच गया है। अभी तक एक किस्त आई है वह भी बंद खाते में भेज दी गई। वार्ड के कलावती, सुरेंद्र, राम कुमार आदि का भी हाल एक जैसा है। सभी ने दफ्तर में अधिकारी के नहीं मिलने और कर्मचारियों पर सुनवाई नहीं करने का आरोप लगाया है। मकान भी तोड़ दिया, अब पैसे भी नहीं मिल रहे: पार्षद

पार्षद राजेश ठाकुर कहते हैं कि वे कर्मचारी और अधिकारी को कहकर थक चुके हैं। गरीबों की मजबूरी भी बता चुके हैं। फिर भी फंड होने के बावजूद किस्त नहीं दी जा रही है। किसी का इस पर ध्यान नहीं है। वहीं कर्मचारी की मानें तो 449 में 182 को विगत दो सालों में मकान बनाने का आर्डर दिया गया है। 13 को तीन किस्त, 27 को दो किस्त और 37 को पहली किस्त दी गई है। 30 की फाइल तैयार की जा रही है तो 13 की फाइल तैयार कर लेखा शाखा को भेजी गई है। डीसीसी बनाने वालों को एक लाख, लेंटर देने वालों को दो लाख और मकान तैयार होने पर 50 हजार रुपये की किस्तें दी जाती है।

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