कुरुक्षेत्र, [जगमहेंद्र सरोहा]। लफ्ज मेरी पहचान बनें तो बेहतर है साहब, चेहरे का क्या वो तो मेरे साथ ही चला जाएगा। एक कविता की ये लाइन पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. गुलजारी लाल नंदा के संघर्ष और सिद्धांतों को दर्शाती हैं। कुरुक्षेत्र को पर्यटन के रूप में विकसित करने का श्रेय अगर किसी को जाता है तो वे स्व. गुलजारी लाल नंदा हैं। उन्होंने ब्रह्मसरोवर के कीचड़ से भरे तालाब को विकसित कर आज एशिया का सबसे सुंदर तालाब की श्रेणी में ला दिया। उनका कदम यहीं तक नहीं थमा बल्कि कुरुक्षेत्र को 48 कोस कुरुक्षेत्र के रूप में पहचान दिलाकर कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन किया और श्रीकृष्ण संग्रहालय स्थापित करने के साथ देश में मजबूत श्रम कानून लाने में विशेष योगदान रहा। वे दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे और केंद्र की सरकार में कई बार बड़ी जिम्मेदारी संभाली। पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा की आज पुण्यतिथि है। आज के दिन उनको याद करना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

ब्रह्मसरोवर की तस्वीर बदली

कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि स्व. गुलजारी लाल नंदा कैथल लोकसभा सीट से 1967 में चुनाव जीते थे। उस वक्त कुरुक्षेत्र कैथल लोकसभा के अंतर्गत आता था। वे कुरुक्षेत्र में सोमवती अमावस्या पर आए थे। पवित्र ब्रह्मसरोवर पर स्नान करने पर गए तो यहां तालाब में कीचड़ था। उन्होंने कीचड़ केे पानी में ही स्नान किया। उन्होंने तालाब को सुधारने के दिशा में काम शुरू किया। इसी सोच के साथ 1968 में कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड का गठन किया। वे 1990 तक बोर्ड के अध्यक्ष रहे। इन सालों में कुरुक्षेत्र के तीर्थ स्थलों को सुधारने के दिशा में काम किया और 48 कोस कुरुक्षेत्र के रूप में पहचान दी। अब कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के अंतर्गत 164 तीर्थ सथल आते हैं। ब्रह्मसरोवर डेढ़ सौ एकड़ में है। इसकी परिक्रमा डेढ़ किलोमीटर लंबी और आधा किलोमीटर चौड़ी है। इसके साथ श्रीकृष्ण संग्रहालय को अपने हाथों से स्थापित किया। इसके अलावा आयुर्वेदिक कालेज एवं विश्वविद्यालय स्थापित करने के साथ ज्योतिसर तीर्थ को विकसित किया।

देश को श्रम कानून और कुरुक्षेत्र को नया रूप दिया

प्रसिद्ध लेखक प्रो. हिम्मत सिंह सिन्हा ने बताया कि वे स्व. गुलजारीलाल नंदा के सहयोगी रहे हैं। वे एक आदर्शवादी व्यक्ति थे। उन्होंने गुलजारी लाल नंदा स्मृति ग्रंथ पुस्तक में उनके जीवन, संघर्ष और व्यक्तित्व के बारे में लिखा है। उन्होंने देश के लिए सबसे मजबूत श्रम कानून बनाए। इन कानूनों को आज तक बदलने की जरूरत नहीं हुई है। वे योजना समिति में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. जवाहरलाल के साथ रहते थे। उद्योगों की प्रगति उनकी देन है। उन्होंने 1922 से 1972 तक करीब 50 वर्ष तक लेबर मूवमेंट चलाया। अहमदाबाद के कपड़ा मिल में मजदूर यूनियन स्थापित की।

सियालकोट से दिल्ली और यहां से कैथल-कुरुक्षेत्र

गुलजारी लाल नंदा का जन्म चार जुलाई 1898 को सियालकोट, पाकिस्तान में हुआ था। उनका देश के स्वाधीनता संग्राम में योगदान रहा। 1921 में असहयोग आंदोलन में भाग लिया। वे इसके बाद दिल्ली आकर बस गए। वे मुंबई विधानसभा में 1937 से 1939 और 1947 से 1950 तक विधायक रहे। वे 1950-1951, 1952-1953 और 1960-1963 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। उन्होंने दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री का दायित्व संभाला। इनका प्रथम कार्यकाल पंडित जवाहर लाल नेहरू के निधन के बाद 27 मई 1964 से 9 जून 1964 और दूसरा कार्यकाल 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966 तक लाल बहादुर शास्त्री के देहांत के बाद रहा। उनको देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न (1997) और दूसरा सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। 15 जनवरी 1998 को उनका निधन हो गया। वे 1967 में कैथल लोकसभा से सांसद चुने गए।

Edited By: Anurag Shukla