पानीपत, जेएनएन। पानीपत और करनाल से पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का गहरा नाता रहा है। राजनीति में पदार्पण करने के साथ ही उनका पानीपत आना जाना था। बीते दिनों की यादें कार्यकर्ता नहीं भूला पा रहे हैं। करनाल में ताऊ देवीलाल और सुषमा स्वराज के बीच हुआ संवाद याद कर कार्यकर्ता अपने प्रिय नेता को याद कर रहे हैं। 

करनाल में भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष अशोक सुखीजा ने बताया कि बात 1989 के लोकसभा चुनाव की है। सुषमा स्वराज भाजपा के टिकट पर करनाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रही थी। उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री ताऊ देवीलाल करनाल दौरे पर आए थे। सुषमा ने चुनाव लडऩे के लिए उनसे आर्थिक मदद मांगी थी। 

इस तरह से जुटाया गया था चंदा
सुखीजा ने बताया कि तब ताऊ देवीलाल ने सुषमा स्वराज से पूछा था कि आपके पास कितने रुपये हैं चुनाव लडऩे के लिए? जितने होंगे उससे दो गुना दूंगा। ये बात कार्यकर्ताओं ने सुन ली। उन्होंने तुरंत चंदा जुटाया और सुषमा स्वराज को दे दिया। इसके बाद ताऊ ने दोगुना चंदा दिया। 

हमेशा महिलाओं को आगे बढऩे को कहतीं थी सुषमा
पानीपत के रोशनमहल निवासी लाला इंद्रसेन गुप्ता आरएसएस के प्रमुख कार्यकर्ताओं में एक थे। 1977 में सुषमा उनके घर आई थी। लाला इंद्रसेन के पुत्र अजय गर्ग ने बताया कि उस समय उनकी उम्र करीब 10 वर्ष थी। उनका मिलनसार स्वभाव शुरू से रहा। महिलाओं को आगे बढऩे के लिए कहती थी। 

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विधायक महिपाल के पक्ष में भी किया प्रचार
वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में ग्रामीण विधायक पद के उम्मीदवार महिपाल ढ़ांडा के पक्ष में प्रचार करने के लिए सुषमा नूरवाला में एक जनसभा को संबोधित करने आईं थीं। तत्कालीन जिलाध्यक्ष गजेंद्र सलूजा और भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता व पूर्व पार्षद लोकेश नांगरु सभा के दौरान उनसे मंच पर मिले। गजेंद्र सलूजा ने बताया कि भाजपा में एक सशक्त महिला नेत्री थीं। बोलने की उनकी कला अनूठी थी।

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तीन बार करनाल से लड़ा चुनाव 
उन्होंने लगातार तीन बार करनाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। लेकिन तीनों चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। पार्टी के स्थानीय नेताओं को जैसे ही उनके निधन की खबर मिली तो उनकी आखें नम हो गई। पार्टी नेताओं ने कहा कि वह बेहद मिलनसार और मृदभाषी थीं। 1980 के दशक में करनाल संसदीय क्षेत्र काग्रेस का एक मजबूत गढ़ बना हुआ था। उस दौर में भाजपा ने सुषमा स्वराज को करनाल से चुनाव मैदान में उतरा। 1980, 1984 और 1989 के लोकसभा चुनाव में उन्हें पार्टी ने टिकट दिया। तीनों बार उनके सामने काग्रेस प्रत्याशी पंडित चिरंजीलाल शर्मा थे। लेकिन वह एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर सकी। 

हार के बावजूद संगठन को मजबूत किया
हार के बावजूद उन्होंने करनाल संसदीय क्षेत्र में संगठन को मजबूती प्रदान की थी। उसका असर आने वाले चुनाव में देखने को मिला। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की टिकट पर आइडी स्वामी उतरे तो उनके सामने भी काग्रेस प्रत्याशी पंडित चिरंजी लाल शर्मा थे। लेकिन इस चुनाव तक पार्टी की नींव करनाल संसदीय क्षेत्र में मजबूत हो गई थी। इस चुनाव में स्वामी ने जीत दर्ज की। 

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गीतासार को जीवन का आधार मानतीं थीं सुषमा
जीवन में एक हजार से ज्यादा गीता उन्होंने अपने हाथों से देश-विदेशों में उच्चायुक्तों और अन्य अधिकारियों को भेंट कीं। जब वे बीमार हुई तो गीता ही उनका संबल बनीं। यह उन्होंने खुद कुरुक्षेत्र की धरती पर बोला था। बताया था कि हर रोज पांच श्लोक पढ़कर उन्हें अपने जीवन में धारण करने का प्रयास करतीं थीं। वे वर्ष 2018 में अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में 18 हजार बच्चों के गीता श्लोकोच्चारण कार्यक्रम में पहुंची थीं। 

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Posted By: Anurag Shukla

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