कुरुक्षेत्र, [विनीश गौड़]। यदि आपको मोबाइल से सेल्‍फी लेने और उसे सोशल मीडिया पर पोस्‍ट करने की आदत है तो सावधान हो जाएं। यह बड़े मनोराेग के खतरे का संकेत हो सकता है। यदि कोई व्‍यक्ति एक दिन में तीन से ज्‍यादा सेल्‍फी लेकर अपने मोबाइल में रखता है या उसे सोशल म‍ीडिया पर शेयर करता है तो यह सेल्‍फाइटिस मनो विकार का शिकार हो सकता है।

21 जून को सेल्फी डे है, लेकिन सेल्‍फी को लेकर नया खुलासा अचंभित करनेवाला है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एक दिन में तीन बार अपने मोबाइल से सेल्फी लेकर उसे सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं तो आप सेल्फाइटिस विकार के बॉर्डर लाइन पर पहुंच गए हैं। मनोरोग विशेषज्ञों ने सेल्फाइटिस को मनोरोग की श्रेणी में रखा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सेल्फाइटिस बिहेवियर के तीन स्केल हैं। पहला बॉर्डर लाइन, दूसरा तीव्र और तीसरा क्रॉनिक।

सेल्फाइटिस विकार का खतरा, स्मार्ट फोन प्रयोग करने वाले ज्यादातर युवा व बच्चे इसकी चपेट में

एलएनजेपी अस्पताल में काउंसलर सीमा ने बताया कि जो बच्चे और युवा स्मार्टफोन प्रयोग कर रहे हैैं, उनमें से ज्यादातर या तो इसके बॉर्डर लाइन पर होते हैं या इसकी चपेट में आ चुके होते हैं। मगर वे इस बीमारी को मानने को तैयार नहीं होते। शुरुआती दो स्टेज में इसे रोका जा सकता है। तीसरी स्टेज में पहुंचने के बाद यह मनोरोग जान के लिए खतरा भी बन सकता है।

उन्‍होंने बताया कि पहली स्टेज में पीडि़त तीन सेल्फी लेकर अपने मोबाइल में रखता है। इसके बाद दूसरी स्टेज आती है, जब वह तुरंत ही इन सेल्फी को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने लगते हैं। यह बीमारी तब ज्यादा खतरनाक रूप ले लेती है जब एक दिन में छह से ज्यादा फोटोज सोशल मीडिया पर आप डालने लगते हैैं।

इसके बाद सेल्फी पर ज्यादा से ज्यादा लाइक और कमेंट जुटाने के लिए अपनी जान तक को जोखिम में डालने से पीछे नहीं हटते। खतरनाक स्थलों पर भी फोटो लेने लगते हैं। कई जगहों पर ट्रेन के ऊपर खड़े होकर, किसी ऊंची इमारत, पहाड़ या किसी ऐसी जगह पर जोखिम उठाकर सेल्फी लेने का दौर खतरनाक हो जाता है।

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नोमोफोबिया को भी जान लें

काउंसलर सीमा बताती हैं कि नोमोफोबिया भी फोन से जुड़ी हुई बीमारी है। नोमोफोबिया से पीडि़त व्यक्ति मोबाइल को अपने से दूर रखने से डरता है। वह सोते हुए तो फोन को अपने साथ रखता ही है साथ ही बाथरूम, टॉयलेट में भी अपने मोबाइल को साथ लेकर जाता है। इस रोग की चपेट में बहुत से युवा हैं। आमतौर पर हर घर में इसकी चपेट में एक व्यक्ति मिल सकता है। पीडि़त व्यक्ति को इस रोग से बाहर आने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और काउंसिलिंग की जरूरत होती है।

 

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Posted By: Sunil Kumar Jha

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