जींद, जेएनएन। Tokyo Olympics 2021: धाकड़ छोरी अंशु मलिक। पहलवानी का जुनून। जीतने की जिद्द। ओलंपिक मेडल का सपना। इस सपने को पूरा करने के लिए रोज छह घंटे की कड़ी प्रैक्टिस। नतीजा टोक्यो ओलंपिक का कोटा झटका। अब अंशु 57 किलो भार वर्ग में ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करेगी।

जींद के गांव निडानी की बेटी अंशु मलिक को 4 से 7 मार्च तक इटली में हुई वर्ल्ड रैंकिंग सीरीज में हैमस्ट्रिंग (जांघ के पीछे मांसपेशी) में चोट लग गई थी। यह समय उसके लिए काफी चुनौती वाला था। क्योंकि ओलंपिक क्वालीफाई टूर्नामेंट के लिए ट्रायल भी मार्च में थे। ऐसे में अंशु अपने पिता के साथ कुश्ती संघ के अध्यक्ष बृजभूषण सिंह से मिली। उन्होंने अंशु की परेशानी देख ट्रायल दस दिन आगे बढ़ाकर 22 मार्च को रख दी और पिता की अपील पर कैंप से छुट्टी देकर घर भेज दिया।

दैनिक जागरण से बातचीत में पिता धर्मबीर कहते हैं कि हर रोज पुराना गुड़ और पूड़े बांधकर सेंकाई की। इससे काफी आराम मिला। फिजियोथेरेपिस्ट की मदद भी ली। ट्रायल के बाद फिर घर पर रहने की इजाजत मिल गई और 8 मार्च तक लगातार फिर पूड़े व पुराना गुड़ बांधा। हैमस्ट्रिंग में चोट के कारण मैट पर प्रैक्टिस नहीं कर सकती थी। इसलिए पिता ने कहा कि प्रतिद्वंद्वी पहलवान को हाथों से पटकना है, इसलिए जिम में खूब हाथों की एक्सरसाइज करो। रोज सुबह-शाम तीन-तीन घंटे तक गांव के चौधरी भरत सिंह मेमोरियल खेल स्कूल की जिम में पसीना बहाया।

पिता कहते हैं कि बेटी को यही कहकर मोटिवेट किया कि यह देश के लिए लड़ाई है। ओलंपिक क्वालीफाई के मुकाबलों के दौरान चोट की तरफ देखना नहीं है। एक दिन के लिए चोट बढ़ जाएगी तो भी कोई बात नहीं। ओलंपिक कोटा हासिल करने के बाद इलाज करा लेना। पिता बताते हैं ओलंपिक में इंट्री होते ही बेटी का फोन किया और खुशी में काफी देर तक आवाज ही नहीं निकली। मां मंजू, दादी बेदो अब बेटी को अोलंपिक विजेता देखना चाहती हैं। निडानी खेल स्कूल में पहलवानों व कोच ने अंशु को ओलंपिक कोटा मिलने पर जश्न मनाया।

रोज 300 ग्राम ड्राई फ्रूट, 200 ग्राम घी व दो किलो दूध

अंशु जब घर पर होती है तो मां मंजू व दादी बेदो देवी उसके खाने-पीने का ध्यान रखती हैं। कैंप में पिता धर्मवीर साथ रहते हैं। हैमस्ट्रिंग की चोट के दौरान अंशु ने घर पर रहकर हाथों की एक्सरसाइज के साथ जमकर खुराक ली। रोज 300 ग्राम ड्राई फ्रूट में बादाम, अखरोट, पिस्ता, अंजीर व काजू लिए। दिनभर में दो किलो दूध व एक किलो फल लेती थी। सुबह व शाम दो-दो रोटियां लेती थी। दोनों समय सब्जी में 200 ग्राम घी डालती थी।

दो साल में करिश्माई प्रदर्शन

गांव निडानी की बेटी अंशु मलिक का जन्म 5 अगस्त 2001 को हुआ था। चौधरी भरत सिंह स्पोर्ट्स स्कूल निडानी में दलीप सिंह, जगदीश श्योरण व कृष्ण मलिक से कुश्ती के गुर सीखे। 2019 में सब जूनियर की खिलाड़ी होते हुए भी दमदार प्रदर्शन के बूते जालंधर में सीनियर नेशनल कुश्ती चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। दिल्ली में एशिया चैंपियनशिप में ब्रांज मेडल, वर्ल्ड कप में सिल्वर मेडल, सेफ गेम्स में गोल्ड मेडल व वर्ल्ड रैंकिंग में सिल्वर मेडल जीता।

दादा, ताऊ, पिता भी रहे पहलवान

अंशु मलिक को पहलवानी विरासत में मिली है। पिता धर्मवीर ने भी कुश्ती की है। दादा मा. बीर सिंह भी पहलवान रहे थे। ताऊ पवन कुमार हरियाणा केसरी और कई बार सीनियर के नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट व भारत कुमार रहे। अब वह पंजाब पुलिस में इंस्पेक्टर हैं। भाई शुभम भी कुश्ती करता है। दादी बेदो देवी के कहने पर पिता धर्मवीर ने अंशु को कुश्ती करवानी शुरू की थी। मात्र एक साल में ही पाइका में गोल्ड मेडल जीतकर उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद जगा दी थी।

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